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वास्तुशास्त्र क्या है ?

“अजी ये वास्तु शास्तु कुछ नहीं होता”,

“अमीरों के चोंचले हैं जी ये वास्तु वुस्तु”

“भाई साब घर में रसोई जहाँ मर्ज़ी बना लो, उससे घर के लोगों की सेहत पर थोड़ी कोई फर्क पड़ जायेगा”

वास्तु के विषय में इस तरह के विचार आपको अक्सर सुनने को मिल जाएंगे। लेकिन आखिर क्या है वास्तुशास्त्र? वास्तव में या तो लोग वास्तुशास्त्र के विषय में पूरी तरह से जानते नहीं या फिर लापरवाही कर जाते हैं। ज़्यादातर लोग घर बनाते समय, या बना बनाया घर खरीदते समय वास्तु का ध्यान नहीं रखते। क्योंकि अधिकतर लोगों का ये मानना है कि इससे कोई ख़ास फर्क नहीं पड़ता। लेकिन फिर उसके बाद घर में हो रहे शारीरिक, आर्थिक, सामाजिक और अन्य कई तरह के कष्टों या हानियों को अपनी किस्मत का दोष मान कर सहते रहते हैं। वो ये समझ भी नहीं पाते कि वास्तु के छोटे-छोटे नियमों का उल्लंघन करने के कारण ही वो ये कष्ट भोग रहे हैं। इसलिए यदि अपने परिवार के भले के लिए वास्तु के नियमों को मानना भी पड़े तो इसमें कोई बुराई नहीं है। यदि अपनों की भलाई के लिए, अपने अहंकार को एक ओर रख कर वास्तु के नियमों को मानना भी पड़े, तो ये अपनों की सुख-शांति के लिए बहुत ही छोटा सा बलिदान है।

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आईये पहले वास्तुशास्त्र को समझने का प्रयास करते हैं और जानते हैं कि क्या है वास्तुशास्त्र? और ये काम कैसे करता है।

वास्तुशास्त्र क्या है ?

वास्तुशात्र बहुत बड़ा विषय है। घर के निर्माण से लेकर, मंदिर या किसी एक ईमारत के निर्माण से लेकर नगर तक के निर्माण की उत्तम विधि के विषय में वास्तुशास्त्र में जानकारी मिल सकती है। इतना ही नहीं भवनों में रखा फर्नीचर और वहां की रूपरेखा भी वास्तुशास्त्र की सीमा रेखा में आते हैं। वास्तव में भवन निर्माण कला ही वास्तुशास्त्र या स्थापत्यवेद कहलाती है।

वास्तुशास्त्र का आधार

वास्तुशास्त्र के अनुसार सृष्टि में एक अदृश्य ऊर्जा विद्यमान हैं जो पूरे विश्व में हर जगह सदैव प्रवाहित होती रहती है। ये ब्रह्माण्डीय ऊर्जा अपने सकारात्मक एवं नकारात्मक दोनों रूपों में विद्यमान रहती है। ये ऊर्जा भवनों आदि में प्रवेश करती है, निकलती है और सदैव बहती रहती है। सकारात्मक ऊर्जा भवन में रहने वाले लोगों पर सकारात्मक प्रभाव डालती है और नकारात्मक ऊर्जा उन लोगों पर नकारात्मक प्रभाव डालती है। भवन की विशेष बनावट से उसमें प्रवाहित होने वाली ऊर्जा में परिवर्तन किया जा सकता है। उस ऊर्जा के प्रवाह को कम या अधिक किया जा सकता है। या उसे रोका जा सकता है। भवन को ऐसा बनाया जा सकता है कि उसमें सकारात्मक ऊर्जा की अधिकता रहे और उसमें रहने वालों पर इसका अधिक प्रभाव पड़े। वे स्वस्थ रहें, संपन्न रहें एवं प्रसन्न रहे।

इस निरंतर प्रवाहित होती ब्रह्माण्डीय ऊर्जा का पूरा लाभ उठाने के लिए सही तरीके से भवन का निर्माण होना आवश्यक है। सही तरीके से भवन निर्माण करने के इस ज्ञान को ही वास्तुशास्त्र, स्थापत्यवेद या स्थापत्य कला कहते हैं। जो हमारे घरों को न सिर्फ सुन्दर बना सकता है बल्कि सुखदायी भी बना सकता है।

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