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नियुद्ध क्रीड़े एक ऐसी युद्ध कला है जिसका जन्म सतयुग में हुआ माना जाता है, और जो ऋषियों द्वारा सीखी और सिखाई गई थी।

नियुद्ध क्रीड़े क्या है? (what is niyuddha kride?)

भारत की भूमि पर कई प्रकार की युद्ध कलाओं का जन्म हुआ है। उनमें से ही एक प्राचीन भारतीय युद्धकला ‘नियुद्ध क्रीड़े’ है। (niyuddha kride is an Indian ancient martial art). यह कला मूल रूप से प्राचीन भारतीय युद्धकला है, जो कि बिना शस्त्रों के आत्मरक्षा एवं घातक प्रहार कर शत्रु को घायल एवं धराशायी करने में सहायक होती है। आइये हम इस कला के इतिहास के बारे में जान कुछ लें।       

नियुद्ध क्रीड़े का इतिहास (history of niyuddha kride)

इस प्राचीन भारतीय युद्धकला का इतिहास भी कई हजारों वर्ष पुराना माना जाता है। ‘नियुद्ध क्रीड़े (niyuddha kride)’ के जनक ‘महादेव भगवान् शंकर जी’ को माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि भगवान् शिव ही संहारक देव हैं इसलिए उन्होंने सृष्टि से पाप का अंत करने हेतु इस कला का सृजन किया था, ताकि भू-लोक पर रहने वाले मानव भी अपनी रक्षा स्वयं कर सकें। उन्होंने इस कला को आत्मरक्षा एवं समाज की सुरक्षा के लिए समर्पित करते हुए मानव जीवन को प्रदान किया। पृथ्वी पर कई महान ऋषिओं-मुनियों के घोर तपस्या करने पर ‘भगवान् शंकर जी’ ने उन्हें ‘‘नियुद्ध क्रीड़े (niyuddha kride)’’ कला प्रदान की और आदेश दिया कि इस कला का उपयोग मानवता की भलाई हेतु किया जाए।

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नियुद्ध क्रीड़े नाम की इस प्राचीन भारतीय युद्ध कला का उद्भव सतयुग में हुआ माना जाता है। उस काल में ऋषिओं-मुनियों ने इस कला का गहन अध्ययन किया और आश्रमों में अपने शिष्यों को शस्त्रकला के साथ-साथ बिना शस्त्रों के लड़ने के यह कला ‘‘नियुद्ध क्रीड़े (niyuddha kride)’’ की शिक्षा भी देनी आरम्भ की।

महर्षि वशिष्ठ के काल त्रेतायुग में भी इस कला को ‘नियुद्ध’ कहा जाता था। इस काल में इस कला को और भी कई अंगों के नामों से जाना जाता था, जैसे कि – बाहुयुद्ध, प्राणयुद्ध, मल्लयुद्ध आदि। इन सभी युद्धकलाओं में आत्मरक्षा एवं शत्रु को घातक प्रहार कर घायल करने एवं स्वयं का बचाव करने की शिक्षा दी जाती थी। इस कला में हाथों, पैरों को ही शस्त्रों की भांति प्रयोग में लाया जाता था।

‘‘नियुद्ध क्रीड़े (niyuddha kride)’’ को बोद्धधर्म के अनुयायियों ने भारत में अपनाया, और इस कला का प्रचार एवं प्रसार विदेशों में भी किया। विदेशों में तो इस कला को केवल शारीरिक व्यायाम एवं आत्मरक्षा तक ही सीमित रखा गया, किन्तु भारत में ‘‘नियुद्ध क्रीड़े (niyuddha kride)’’ को मानसिक, शारीरिक एवं अध्यात्मिक पक्ष से भी जोड़ दिया गया। इसे एक साधना एवं भक्ति की दृष्टि से सीखा जाने लगा।

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‘‘नियुद्ध क्रीड़े (niyuddha kride)’’ कला का वर्णन प्राचीन धर्मग्रंथों – रामायण, महाभारत, शिवपुराण, दुर्गापुराण आदि में भी मिलता है। भारतीय पौराणिक ग्रंथों में नियुद्ध कला के कई रूप भी देखने को मिलते हैं, जिन्हें कि द्वन्दयुद्ध, बाहुयुद्ध, प्राणयुद्ध एवं मल्लयुद्ध के नाम से भी जाना जाता है। ‘‘नियुद्ध क्रीड़े (niyuddha kride)’’ कला की कई प्राचीन शैलियाँ भी इन ग्रंथों में रचित हैं, जिनके नाम कुछ इस प्रकार से हैं: हनुमंती, भीमसेनी, जरासंधी, जामवंती आदि।

पौराणिक ग्रंथों में ‘‘नियुद्ध क्रीड़े (niyuddha kride)’’ का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि त्रेतायुग में भगवान् श्रीराम, लक्ष्मण, भारत, शत्रुघ्न, परशुराम, जामवंत, हनुमान, सुग्रीव, बाली तथा अंगद इस विद्या में निपुण थे। द्वापर युग में भगवान् श्रीकृष्ण, बलराम, भीम, जरासंध, दुर्योधन, घटोत्कच और कई कौरव एवं पांडव भी इस कला के अच्छे जानकर थे। माँ काली, माँ दुर्गा द्वारा भी निशस्त्र ही राक्षसों का वध करने का वर्णन भी पुराणों में मिलता है।

बिना हथियारों के लड़ी जाने वाली ये कला ‘‘नियुद्ध क्रीड़े (niyuddha kride)’’ को भारत के केरल प्रदेश में भगवान् परशुराम जी द्वारा रचित एक कला के साथ भी जोड़ा जाता है जिसे कि ‘कलारीपयतु’ के नाम से जाना जाता है। यह कला आज भी केरल में प्रचलित है। ‘नियुद्ध क्रीड़े (niyuddha kride)’ आज भी भारत के अलावा विदेशों में भी अलग-अलग नामों-रूपों में प्रचलित है।                        

मित्रों इस कला से जुडी और भी जानकारी हम आपको समय-समय पर देते रहेंगे, यदि आपके पास भी इस प्राचीन भारतीय युद्ध कला (ancient indian martial art)के विषय में कोई जानकारी या सुझाव है तो हमें अवश्य लिखें.

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भारतीय युद्ध कलाओं में मेरी रुचि शुरू से ही काफी रही है। घर की दीवार पर टंगा नॉनचक मुझे हमेशा चिढ़ाता रहता है। अलग अलग मार्शल आर्ट्स के बारे में जानने की ललक मुझमें हमेशा से ही रही। कई अलग अलग मार्शल आर्ट्स के बारे में मैं अक्सर रिसर्च करता रहता हूँ। जब भी कुछ नया सामने आता है तो कोशिश करता हूँ कि उसे एक लेख के रूप में पिरो कर आपके सामने रखूँ। इसमें युद्ध कलाओं की अधिकता होती है लेकिन इसके अलावा भी अगर मुझे कुछ लिखने का मौका मिले तो मैं चूकता नहीं।