मुकना: एक मणिपुरी मल्लयुद्ध कला

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साभार सहित www.wildfilmsindia.com के youtube channel से ली गई तस्वीर

मणिपुरी मल्लयुद्ध कला मुकना के विषय में बहुत कम लोग ही जानते होंगे। भाषा की तरह अलग-अलग क्षेत्रों में, युद्ध एवं द्वंद्व कलाओं के भी अलग-अलग रूप देखने को मिलते हैं। भारत में प्रचलित कई द्वन्द्व कलाओं में से एक है मणिपुरी मल्लयुद्ध कला मुकना।

वास्तव में मणिपुरी मल्लयुद्ध कला मुकना एक ऐसी द्वन्द्व कला है, जिसने पारम्परिक व्यायाम एवं खेल कलाओं को आज भी जीवंत रखा हुआ है। यह मल्लयुद्ध कला मुकना, भारत के उत्तर-पूर्वी राज्य ‘मणिपुर’ से सम्बन्ध रखती है। यह एक प्रकार की ‘मल्लयुद्ध’ या ‘कुश्ती’ की कला है। यह दो खिलाडियों के बीच एक अखाड़े में खेली जाती थी। आइये हम इस कला से आपका परिचय कराएं।

मुकना के शाब्दिक अर्थ

यह कला बिना शस्त्रों के अर्थात ‘खाली हाथ’ (निहत्थे) ही खेली जाने वाली एक युद्धकला है। ‘मुकना’ शब्द का मणिपुरी भाषा में अर्थ है (मुक + ना = मुकना) मुक्के, घूंसे या लात का प्रयोग न करना। अर्थात बिना मुक्के, घूंसे या लात के प्रयोग के ही खिलाड़ी को गिराना या धराशायी करना। यह कला भी अन्य मल्लयुद्ध कलाओं की ही तरह कई वर्षों तक कठोर परिश्रम करके सीखी और खेली जाती है। इसमें भी अत्यधिक शारीरिक बल, स्फूर्ति एवं बुद्धि का उचित प्रयोग करना होता है।

मणिपुरी मल्लयुद्ध कला मुकना का इतिहास

मणिपुरी मल्लयुद्ध कला मुकना काफी प्राचीन युद्धकला है। इस कला का उदभव काल लगभग सत्रहवीं शताब्दी में सन 1891 ईस्वी माना जाता है। इस कला को मणिपुर में एक पारम्परिक त्यौहार ‘हराओबा’ (haraoba) के अंतिम दिन खेला जाता है। इसे खेलने का स्थान होता है मंदिर या खुले मैदान में बना अखाड़ा। मणिपुर के अलावा इसे इम्फाल, थोबल और विष्णुपुर नामक स्थान पर खेला जाता है।

इतिहासकारों के अनुसार, मणिपुरी राजाओं ने अपने दरबार में ‘मल्लयुद्ध’ के खिलाड़ियों को विशेष स्थान दे रखा था। उस समय जहाँ सैनिकों को शस्त्र-विद्या सिखाई जाती थी, वहीं सिखाने वालों में मल्लयुद्ध के गुरु भी शामिल थे। उन राजाओं का मानना था कि इससे युवा शक्ति गतिमान रहती है। युवाओं को बचपन से ही कड़ा अभ्यास कराकर इस कला में निपुण बनाया जाता था। इस खेल में प्रतियोगिता को जीतने वाले खिलाडी को भी विशेष राजकीय सम्मान दिया जाता था। कुछ मणिपुरी राजा भी इस कला के अच्छे खिलाडी थे, जिनका उल्लेख मणिपुरी युद्धकला के इतिहास में मिलता है।

मुकना की युद्धकला शैली

मणिपुरी मल्लयुद्ध कला मुकना में दो खिलाडियों को एक अखाड़े में खेलने के लिए तैयार किया जाता है। दोनों खिलाड़ियों को अपनी कमर पर कपड़े की एक मजबूत बेल्ट बांधनी पड़ती है। दोनों को ही केवल कमर या बेल्ट से पकड़कर दूसरे खिलाड़ी को उसके पैरों से उखाड़कर चित करना या कमर के बल गिराना होता है। खिलाड़ी का दूसरे के बालों, पैरों, कान या गर्दन को पकड़ना या खींचना बिलकुल मना होता है।

इस खेल को भी तीन राउंड में खेला जाता है। जीते हुए खिलाड़ी को उसकी योग्यता के आधार पर सम्मानित किया जाता है। दोनों खिलाड़ियों को उनके शरीर के वजन के आधार पर ही लड़ने के लिए अखाड़े में उतारा जाता है। यदि दोनों खिलाड़ियों के शारीरिक वजन में समानता ना हो, तो उनके बीच ये प्रतियोगिता नहीं होती। यह खेल आज भी मणिपुर में कला एवं परम्परा को जीवित रखे हुए है, और युवाओं को अत्यधिक आकर्षित करता है।

हम आपको इस कला के बारे में और भी अधिक जानकारी देने का प्रयास करते रहेंगे। इस कला के इतिहास से सम्बंधित यदि आपके पास कुछ अन्य जानकारी या सुझाव है तो हमें अवश्य लिखें।

(तजिंदर सिंह)  

धन्यवाद

इस लेख में ऊपर दिखाई गई तस्वीर के लिए हम Wild Films India का धन्यवाद करते है। इनके एक यूट्यूब वीडियो से इस तस्वीर को साभार लिया गया है।   

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भारतीय युद्ध कलाओं में मेरी रुचि शुरू से ही काफी रही है। घर की दीवार पर टंगा नॉनचक मुझे हमेशा चिढ़ाता रहता है। अलग अलग मार्शल आर्ट्स के बारे में जानने की ललक मुझमें हमेशा से ही रही। कई अलग अलग मार्शल आर्ट्स के बारे में मैं अक्सर रिसर्च करता रहता हूँ। जब भी कुछ नया सामने आता है तो कोशिश करता हूँ कि उसे एक लेख के रूप में पिरो कर आपके सामने रखूँ। इसमें युद्ध कलाओं की अधिकता होती है लेकिन इसके अलावा भी अगर मुझे कुछ लिखने का मौका मिले तो मैं चूकता नहीं।