मल्लयुथम एक प्राचीन द्वंद्व युद्धकला

मल्लयुद्ध या कुश्ती कला, तमिल नाडू की प्राचीन द्वंद्व युद्धकला
तमिल नाडू की प्राचीन द्वंद्व युद्धकला है मल्लयुथम

भारत की भूमि पुरातन काल से ही कलाओं का गढ़ रही है। यहाँ पर कई प्रकार की युद्ध कलाएं प्रचलित हुई, जिन कलाओं ने भारत की परंपरा एवं संस्कृति को विश्वभर में एक अलग पहचान दिलाई। आज भी यह युद्ध कलाएं हमारी विरासत का प्रतीक बनी हुई हैं।

तमिल नाडू की प्राचीन द्वंद्व युद्धकला है मल्लयुथम (mallyutham is an ancient martial art of tamil nadu)    

भारत की यह प्राचीन युद्ध कलाएं भारत के भिन्न-भिन्न प्रदेशों में अलग-अलग तरह से खेली एवं प्रदर्शित की जाती हैं। तमिल नाडू भी कई प्राचीन भारतीय युद्ध कलाओं का प्रदेश माना जाता है। ऐसी ही एक कला जो कि बिना ‘अस्त्रों-शस्त्रों’ के बिना हथियारों के निहत्थे ही खेली जाती है। इस प्राचीन द्वंद्व युद्धकला कला का नाम है ‘मल्लयुथम’। आइये इस कला के विषय में जानकारी लें।

मल्लयुथम क्या है? (what is mallyutham?)

यह कला मुख्यत रूप से एक प्रकार की ‘मल्लयुद्ध’ की ही कला है। लेकिन इसके मूल-सिद्धांत और खेलने की शैली ‘कुश्ती’ या ‘मल्लयुद्ध’ से भिन्न है। यह कला दक्षिण भारत में तमिल नाडु प्रदेश से सम्बन्ध रखती है। इस कला में विशेष बात यह है कि यह मूलतः मल्लयुद्ध या कुश्ती कला से भिन्न हैं। अधिकांश मल्लयुद्ध या कुश्ती कला में खिलाडी का शारीरिक रूप से बलवान होना आवश्यक होता है। लेकिन मल्लयुथम कला को दुबले-पतले और फुर्तीले शरीर वाले व्यक्ति भी सीख सकते हैं। क्योंकि अधिकांश यह माना जाता है कि पहलवानी करने वाला व्यक्ति भारी-भरकम शरीर का स्वामी होना चाहिए। लेकिन इस कला में ऐसा नहीं होता। मल्लयुथम कला का निपुण खिलाडी अपने से अधिक ताकतवर व्यक्ति को भी बल एवं बुद्धि से परास्त कर सकता है। इस कला को सीखने में कई वर्षों का कठिन अभ्यास करना पड़ता है।      

आइये हम इस कला के प्राचीन इतिहास पर एक नज़र डाल लें।   

क्या है मल्लयुथम का प्रारम्भिक इतिहास? : (what is early history of mallayutham?)

मल्लयुथम कला का जन्म लगभग नौवीं शताब्दी में दक्षिण भारत के तमिलनाडु प्रदेश में हुआ। इस कला का उदभव काल ‘तमिल-संगम-युग’ (जो कि वैदिक काल से कई हजारों वर्ष पुरातन है) के समय हुआ माना जाता है। उस समय के दक्षिणी भारत के तमिल साम्राज्य में कई शक्तिशाली राजाओं का शासन कई अलग-अलग राज्यों में बंटा हुआ था। मुख्यत यह समय चेर, चोल तथा पाण्ड्य वंश का राज्यकाल माना जाता है। यह सभी राजा ‘शारीरिक-बल’ एवं ‘शक्ति-प्रदर्शन’ को एवं अपने सैनिकों में आत्मबल को जाग्रत रखने हेतु इस प्रकार की युद्धकलाओं को अपने राज्य में एक खेल परम्परा के रूप में जीवित रखे हुए थे। इन राज्यों के लोग अधिकांश परिश्रमी, मेहनती एवं अपने राज्य के प्रति समर्पण भाव से प्रेरित होते थे। उसी समय में जंगलों में कई ऋषि-मुनि जो कि इस ‘द्वन्द-युद्ध’ की इस कला को जानते थे। उन्होंने राजाओं के अनुरोध पर ‘मल्लयुथम’ नाम की कला को राज्य के लोगों विशेषकर सैनिकों को सिखाना आरम्भ किया। उन योग्य गुरुओं के सरंक्षण में और कई वर्षों के कठिन अभ्यास के पश्चात ही लोग इस कला को सीख पाते थे। क्योंकि लगभग तेरहवीं से सत्रहवीं शताब्दी के काल में ‘उत्तर-भारतीय’ युद्धकला के विशेषज्ञों ने इस कला में काफी तरह के परिवर्तन कर इसे ‘मल्लयुथम’ कला से अलग कुश्ती का रूप दिया जिसे कि ‘मल्लयुद्ध’ कहा जाता है। लेकिन जो भी हो यह कला ‘मल्लयुथम’ भी शारीरिक-बल एवं बुद्धि के सही-समय पर सही-प्रयोग की नीति पर ही आधारित है।

क्या है मल्लयुथम की युद्धकला शैली? (what is war style of mallyutham?)

इस कला की शैली उत्तर भारत की ‘मल्लयुद्ध’ कला से बहुत भिन्न है। यह कला भी अखाड़े में दो खिलाडियों के बीच खेली जाती है। इस कला में शारीरिक अभ्यास के साथ-साथ अखाड़े में दोनों खिलाड़ियों के बीच खेलते समय अपनाये जाने वाले नियम भी मूल ‘मल्लयुद्ध’ की कला से अलग हैं। इस कला में दो खिलाडी एक अखाड़े में एक दूसरे से द्वंद्व युद्ध करते हैं। वह दोनों खिलाडी एक विशेष मुद्रा में गोलाकार घूमते हुए अपने प्रतिद्वंदी पर प्रहार करते हैं। इसमें हाथों का प्रयोग बड़ी ही फुर्ती से करते हुए दूसरे खिलाडी को भूमि पर गिराना या चित करना होता है। लेकिन साथ ही कलाबाज़ी खाते हुए सीधा जमीन पर खड़ा भी होना होता है। इस कला में सीधे तौर पर पैरों से प्रहार नहीं किया जा सकता। केवल दांव-पेंच लगाकर ही पैरों का प्रयोग करते हुए अपने प्रतिद्वंदी को गिराया जा सकता है। इस कला का खिलाडी भले ही शारीरिक रूप से ज्यादा ताकतवर न लगे लेकिन वह तब भी अपने से अधिक शक्तिशाली व्यक्ति को धराशायी कर सकता है। मल्लयुथम कला को सीखने के लिए कई वर्षों का कड़ा अभ्यास करना पड़ता है।       

क्या आज भी जीवित है प्राचीन मल्लयुथम कला? (is it still alive ancient martial art mallyutham?)

मल्लयुथम’ के अभ्यास के दौरान भी उन खिलाड़ियों की आपस में प्रतियोगितायें आयोजित की जाती थी, और जीतने वाले खिलाड़ी को ‘विशेष-राजकीय-सम्मान’ दिया जाता था। इस कला का इतिहास दक्षिण भारतीय (लगभग नौवीं शताब्दी) मुख्यत यह समय चेर, चोल तथा पाण्ड्य वंश का राज्यकाल माना जाता है। यह साम्राज्य ‘तमिल्क्कम’ के राजा ‘मालियम’ ( जिसे की तमिल में राजा-मेरपोर ) के नाम से भी जाना जाता है, के काल में हुआ। इस काल में भी इस कला का काफी प्रचार एवं प्रसार किया गया। इस कला को आज भी तमिल के लोगों ने अपनी प्राचीन खेल-परम्परा के रूप में जीवित रखा है। आज भी यह कला तमिल नाडू प्रदेश के कुछ स्थानों पर खेली जाती है।

आधुनिक काल में मल्लयुथम (mallyutham in modern times)

यह कला कई अलग-अलग नामों ( कुश्ती, मल्लयुद्ध, पहलवानी ) से आज भी भारत देश के कर्नाटक, गुजरात, हरियाणा, पंजाब आदि प्रदेशों में काफी लोकप्रिय है। इस कला का प्रभाव दक्षिण-पूर्व एशिया में भी बहुत फैला, और आज भी यह कला जावा, मलेशिया, थाईलैंड, चीन, जापान आदि देशों में अलग-अलग रूपों में खेली जाती है।  

इस लेख में ऊपर दिखाई गई मल्लयुथम कला की तस्वीर के लिए हम Varmakalai Varmakalai ( Youtube Channel ) का धन्यवाद करते है। इनके एक यूट्यूब वीडियो से इस तस्वीर को साभार लिया गया है।

इस कला के इतिहास से सम्बंधित यदि आपके पास कुछ अन्य जानकारी या सुझाव है तो हमें अवश्य लिखें.  धन्यवाद

By ताजेंदर सिंह

भारतीय युद्ध कलाओं में मेरी रुचि शुरू से ही काफी रही है। घर की दीवार पर टंगा नॉनचक मुझे हमेशा चिढ़ाता रहता है। अलग अलग मार्शल आर्ट्स के बारे में जानने की ललक मुझमें हमेशा से ही रही। कई अलग अलग मार्शल आर्ट्स के बारे में मैं अक्सर रिसर्च करता रहता हूँ। जब भी कुछ नया सामने आता है तो कोशिश करता हूँ कि उसे एक लेख के रूप में पिरो कर आपके सामने रखूँ। इसमें युद्ध कलाओं की अधिकता होती है लेकिन इसके अलावा भी अगर मुझे कुछ लिखने का मौका मिले तो मैं चूकता नहीं।

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *