(साभार सहित: ultimate-kravmaga.com से लिया गया चित्र) चित्र में गुरु सुमेर सिंह जी 'श्री बलवंत व्यायामशाला में लाठी चलाना सिखाते हुए

प्राचीन भारतीय लाठी कला (ancient indian lathi fighting art)

भारत में प्राचीन काल से ही कई प्रकार की युद्धकलाएं (war arts or martial arts)  प्रचलित हैं, जिनमें निहत्थे लड़ने से लेकर विभिन्न प्रकार के शस्त्रों से लड़ने की कलाएं भी विद्यमान हैं। कुछ कलाएं ऐसी हैं जिनमें कई घातक शस्त्रों का प्रयोग किया जाता है, और कुछ कलाएं ऐसी हैं, जिनमें खाली हाथ बिना हथियार ही युद्ध करके शत्रु को धराशाई किया जाता है। ऐसे ही एक शस्त्र है लाठी, जो कि देखने में तो इतना घातक नहीं लगता, लेकिन है ये बहुत घातक और जानलेवा। प्राचीन काल से ही इसे प्रयोग में लाया जाता रहा है। इस शस्त्र का भारतीय नाम है ‘लाठी’।

क्या है लाठी (what is lathi)

लाठी आम तौर पर बांस की बनी होती है। इसकी लम्बाई लगभग 6 से 8 फीट तक होती है। उत्तर भारतीय क्षेत्रों में इसे आम तौर पर भी लोग अपने पास रखते हैं। इसे अपने पास रखने के लिए किसी ख़ास प्रशिक्षण की आवश्यकता नहीं पड़ती, किन्तु खास तरीके से इसे चलाने के लिए आपको इसके अच्छे प्रशिक्षण की ज़रुरत होती है। इस लाठी से खेली जाने वाली कला को ‘लाठी-खेल’ के नाम से भी जाना जाता है।

प्राचीन भारतीय लाठी कला का इतिहास  (history of ancient indian lathi fighting art)

इस कला का भी भारत में काफी पुराना इतिहास है। इतिहासकारों के अनुसार आदिकाल से ही जब मनुष्य को अपनी सुरक्षा और असुरक्षा का ज्ञान हुआ तो उसने जंगली जीवों से अपनी रक्षा करने हेतु पत्थर के टुकड़ों, पेड़ों की मजबूत टहनियों और शाखाओं को तोड़कर हथियार के रूप में प्रयोग किया। उस समय मानव सभ्यता उतनी विकसित नहीं थी कि अपने लिए आत्मरक्षा के हथियार बना सकती। धीरे-धीरे मानव सभ्यता का विकास हुआ, और आदिमानव ने सभ्यता का विकास एवं परिवर्तन करना आरम्भ किया। आदि मानवों की पुरानी गुफाओं की दीवारों पर ऐसे चित्र दिखाई पड़ते हैं, जिनमें कि मनुष्य को अपनी रक्षा करने हेतु पेड़ों की टहनी, डंडा या लाठी का प्रयोग जंगली जानवरों को डराने या भगाने के लिए करते हुए दिखाया गया है। धीरे-धीरे मानव सभ्यता और भी अधिक विकसित हुई, और मनुष्य ने अपनी सुरक्षा हेतु, अपना पेट भरने के लिए शिकार करने हेतु, कई प्रकार के औजारों एवं हथियारों का निर्माण करना शुरू कर दिया। इन्हीं में से एक ऐसे शस्त्र का जन्म हुआ जिसका रूप तो आज भी दिखने में उतना ही प्राचीन है, लेकिन इससे खेले जाने वाली युद्धकला का रूप समय-समय पर बदलता रहा है।

लाठी का आम जीवन में प्रयोग (use of lathi in normal life)

लाठी चलाने, घुमाने की कला का उद्भव भारत के गावों, विशेषतौर पर पूर्वी एवं दक्षिणी भारत के कई प्रदेशों में हुआ माना जाता है। लाठी एक ऐसा हथियार था, किसान एवं जमींदार लोग अपने पास हमेशा रखते थे। इसका प्रयोग अक्सर घरेलू जानवरों को डराने-नियंत्रण में रखने के लिए किया जाता था। जिस प्रकार तमिल-युद्धकला ‘सिलम्बम’ में कई प्रकार के अस्त्रों-शस्त्रों के प्रयोग के साथ साथ बांस की लाठी या छड़ी (bamboo stick) को घुमाना चलाना, बचाव के लिए प्रयोग करना सिखाया जाता है, ठीक उसी प्रकार इस शस्त्र ‘लाठी’ ने भी अपना एक स्वतंत्र रूप ले लिया और आत्मरक्षा के साथ-साथ किसानों एवं जमींदारों के गौरव का भी प्रतीक भी बन गई। इसी प्रकार लाठी को गौरवान्वित करती हुई एक भारतीय कहावत भी बहुत प्रचलित है ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ अर्थात जिसके पास बल या शक्ति है, वही विजय का हकदार है।

लाठी एवं ज़मींदार (lathi and zameendar)

धीरे-धीरे भारतीय गावों में किसानों एवं जमीदारों ने लाठी खेलने की कला का अभ्यास किया। उन्होंने लाठी कला के अभ्यस्त लोगों का एक समूह बनाया, जिन्हें कि ‘लठैत’ कहा जाता था। ‘लठैत’ लोग हमेशा गावों के जमींदारों के साथ सुरक्षाकर्मी के रूप में चला करते थे। समय बदला और इस कला ने गावों में खेले जाने वाली एक पारम्परिक कला का रूप लिया। इसे अब इस कला के जानकार प्रशिक्षित गुरु के सरंक्षण में सिखाया जाने लगा। अब गावों में लगने वाले मेलों और त्योहारों में भी ‘लाठी खेल’ कला का प्रदर्शन किया जाने लगा। भारत में ‘भगवान् श्री कृष्ण’ की जन्म भूमि ‘मथुरा वृन्दावन’ में तो होली का एक विचित्र रूप प्रचलित है जिसे ‘लट्ठमार होली’ के नाम से जाना जाता है। इसमें गाँव की औरतें गाँव के युवकों पर लाठी से वार करती हैं, और युवक उसके बचाव में चमड़े से बनी ढाल या टोकरी का इस्तेमाल करते हैं।

लाठी खेल को बांग्लादेश, तमिलनाडु के अलावा, गुजरात, हरियाणा एवं पंजाब में भी खेला जाता है। पंजाब में इस ‘लाठी-कला’ का एक रूप सिख-युद्धकला ‘गतका’ में भी देखने को मिलता है। ‘गतका’ में खिलाड़ी  को तलवार चलाने की शिक्षा देने से पहले ‘लाठी’ से खेलना सिखाया जाता है। जब खिलाड़ी लाठी से खेलना सीख जाता है तो ही उसे तलवार चलाना सिखाया जाता है।

लाठी आधुनिक युग में (lathi in modern time)

आधुनिक युग में लाठी का प्रयोग कई जगहों पर सुरक्षा के लिए, विशेषतौर पर भारतीय पुलिस को भी लाठी दी जाती है. भीड़ को नियंत्रित करने के लिए भी अक्सर लाठी का ही प्रयोग किया जाता है. इसके अलावा लाठी का प्रयोग चौकीदार, गार्ड आदि सुरक्षाकर्मी भी करते हैं. यह खेल आज भारत में काफी कम हो चुका है, लेकिन सुरक्षा की दृष्टि से आज भी ‘लाठी’ का प्रयोग किया जाता है.                   

लाठी कला के इतिहास से सम्बंधित यदि आपके पास कुछ अन्य जानकारी या सुझाव है तो हमें अवश्य लिखें. (तजिंदर सिंह)  

धन्यवाद