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with Courtesy to: gaya.nic.in/ गया, बिहार जहाँ पितरों का श्राद्ध करने के लिए दूर दूर से आते हैं लोग

क्यों मिलता है ‘गया’ में श्राद्ध और पिंडदान करने से मोक्ष?

‘गया’ भारत के बिहार राज्य में स्थित एक हिन्दुओं का बहुत ही महत्त्वपूर्ण तीर्थ स्थल है। गया स्थान से लगभग 10 किलोमीटर पर एक स्थान है जिसका नाम है ‘बोध गया’। जहाँ पर भगवान् बुद्ध ने ज्ञान अर्जित किया था। बुद्ध ऋषि ने ही बौध धर्म की स्थापना की थी। गया और बोध गया इन दोनों ही स्थानों पर हिन्दू धर्म के लोग अनेक राज्यों से यहाँ आते हैं और अपने पितरों का श्राद्ध और पिंड दान करते हैं। भारत के इतिहास में बताया गया है कि, गया, कुरुक्षेत्र, हरिद्वार, पेहवा, यह सभी ऐसे तीर्थ स्थान है। जहां पर आत्मा को मुक्ति देने के लिए पिंडदान, श्राद्ध एवं तर्पण किया जाता है। गया में विधि विधानपूर्वक अपने पूर्वजों का श्राद्ध करने से उनकी मुक्ति का मार्ग पूर्ण रुप से प्रशस्त हो जाता है। जो भी मनुष्य गया में आकर श्राद्ध और तर्पण करता है, उनके पूर्वजों को मुक्ति तो मिलती ही है। साथ ही जो यहाँ श्राद्ध कर्म करवाता है उसे भी हर तरह के अच्छे फल प्राप्त होते हैं।

गया एक धार्मिक तीर्थ स्थान है। जहां पर लगभग 4000 की संख्या में छोटे और बड़े मंदिर हैं। कहा जाता है कि जब तक इस तीर्थ स्थान की यात्रा नहीं की जाती है। तब तक पित्रों को मोक्ष तथा सद्गति प्राप्त नहीं होती है।

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गय राक्षस और स्वर्ग भेजने का वरदान

पुराने समय में एक गय नाम का राक्षस था। उसने अपनी कड़ी तपस्या से वरदान प्राप्त कर लिया था। कि जो भी व्यक्ति उसको स्पर्श करेगा, वह सीधा स्वर्ग लोक चला जाएगा। इस वजह से देवता गण तथा यमराज बहुत परेशान रहने लगे। फिर भगवान विष्णु जी के बहुत समझाने पर गय अपने प्राणों को त्यागने के लिए तैयार हुआ। गय को उत्तर दिशा की ओर सिर तथा दक्षिण दिशा की तरफ पैर करके सुला दिया गया। गय के द्वारा प्राणों का परित्याग करने के पश्चात भी गय का सिर हिलता ही रहा। ब्रह्मा जी के द्वारा गय के सिर पर शिला रखने पर भी सिर का हिलना बंद नहीं हुआ। इसके बाद सभी देवतागण उस शिला पर खड़े हो गए। तब कहीं जाकर गय का सिर हिलना बंद हुआ और वह मोक्ष को प्राप्त हुआ। गय के द्वारा किए गए इस कर्म से विष्णु जी ने प्रसन्न होकर गय को वरदान दिया। कि यह स्थान तुम्हारे नाम गया से प्रसिद्ध होगा। और सभी देवता गण यहां पर आकर विश्राम करेंगे। जो भी मनुष्य गया में आकर पिंडदान, दाह संस्कार आदि करेगा उसके पूर्वजों को ब्रह्मलोक की प्राप्ति होगी। साथ ही वह व्यक्ति जो यह सारी क्रियायों को करता है, उसे भी ब्रम्ह्लोक की प्राप्ति होती है। गया में आने मात्र से ही पितृ ऋण से मुक्ति मिल जाती है। जिस भी मनुष्य की मृत्यु सांप के काटने या किसी जानवर के काटने से होती है या किसी की हत्या कर दी जाती है। उनका गया में श्राद्ध कर्म पूरा करने पर वह सीधे स्वर्ग लोक को जाते हैं। इस स्थान पर विष्णु जी पितृ देवता के रूप में निवास करते हैं।

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ऐसा कहा जाता है कि जो भी पुत्र गया में श्राद्ध करने की इच्छा से आता है। तो उनके पितर उनको गया में देखकर अधिक आनंदित हो जाते हैं। जैसे किसी भी उत्सव में व्यक्ति अधिक उत्साहित रहता है। ठीक उसी प्रकार हमारे पूर्वज भी आनंदित होकर खुशियां मनाते हैं। हिंदू के जीवन का अंतिम संस्कार श्राद्ध होता है। जिसके साथ वह अपने जीवन का आखिरी अध्याय समाप्त करता है। इस संसार से जब व्यक्ति विदा लेता है, तो उसके सगे संबंधी जो जीवित हैं। वह ब्रह्मलोक में उसके सुख और शांति तथा कल्याण के लिए उनका श्राद्ध करते हैं। क्योंकि हिंदुओं के लिए सांसारिक लोक की अपेक्षा परलोक का अधिक महत्व रहता है।

अतः शास्त्रों में कहा गया है कि पितृ लोगों की यह अभिलाषा बनी रहती है। कि उनके पुत्र हमारे उद्धार के लिए गया में आकर उनका पिंडदान तथा श्राद्ध करेंगे। और पितर उनसे प्रसन्न होकर उन्हें आशीर्वाद देते हैं जिससे उनका कल्याण होता है।

वेदों और पुराणों में कहा जाता है कि अगर आप अपने पितरो का उद्धार अथवा मुक्ति चाहते है। और उन्हें अन्य नर्क योनियों से मुक्ति दिलाकर उन्हें स्वर्ग भेजना चाहते है। तो, गया तीर्थ स्थान पर जाकर उनका पिंडदान, श्राद्ध, और तर्पण अवश्य करे।