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कुट्टू वरिसाई एक दक्षिण भारतीय प्राचीन युद्धकला

क्या हैं ‘कुट्टू वरिसाई’ के शाब्दिक अर्थ? (what is the meaning of kuttu varisai?)

कुट्टू वरिसाई (kuttu varisai) भारत में मौजूद उन प्राचीन युद्ध कलाओं में से एक है जिनमें विभिन्न शस्त्रों के साथ या निशस्त्र (सिर्फ हाथों पैरों से) लड़ना सिखाया जाता है। लड़ने की इस कला कुट्टू वरिसाई (kuttu varisai)  में खाली हाथ लड़ना सिखाया जाता है। कुट्टू वरिसाई एक दक्षिण भारतीय प्राचीन युद्धकला है जो कि दक्षिण भारत में बहुत प्रचलित है। इसके नाम से ही इस कला के विषय में काफी कुछ पता चल जाता है। इसके नाम ‘कुट्टू वरिसाई’ (kuttu varisai)’ का शाब्दिक अर्थ है, ‘कुट्टू’ अर्थात तीव्र गति से मुष्टि-प्रहार (अर्थात मुक्के से प्रहार करना) और ‘वरिसाई’ अर्थात आदेश या अनुक्रम का पालन करना। यानि अनुशासन-बद्ध तरीके से दिए गए आदेश का तीव्र गति से (पंच या मुष्टि का प्रयोग करते हुए) पालन करते हुए प्रहार एवं बचाव करना। यह एक ऐसी अद्भुत युद्ध कला है जो बिना किसी हथियार के ही आत्मरक्षा करने तथा प्रतिद्वंदी को धराशायी करने के काम आती थी।

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क्या फर्क है ‘कुट्टू वरिसाई’ एवं ‘सिलमबम’ युद्धकला में? (what is the difference between kuttu varisai and ‘silambam’ martial art?)

वास्तव में यह कला एक अन्य युद्धकला ‘सिलमबम (silambam)’ का ही एक अभिन्न अंग है। बस फर्क केवल इतना है कि इस कला में शस्त्रों का प्रयोग नहीं किया जाता। इस कला में हाथों और पैरों को ही हथियारों की तरह घातक रूप में प्रयोग किया जाता है। ‘सिलमबम (silambam)’ की एक प्रमुख एवं आरंभिक शैली ‘कालदी’ से इसको जोड़कर देखा जाता है। इसका कारण ये है कि जिस प्रकार ‘कालदी’ में व्यायाम के साथ-साथ बांस की स्टिक को भी घुमाना, चलाना सिखाया जाता है। उसी प्रकार से ‘कुट्टू वरिसाई’ में उन्हीं मुद्राओं का प्रयोग बिना शस्त्रों के किया जाता है।

प्राचीन भारतीय अदभुत युद्ध कलाओं का इतिहास

क्या है कुट्टू वरिसाई का इतिहास? (what is the history of kuttu varisai?)

यह कला दक्षिण भारत में तमिलनाडु एवं पूर्वी श्रीलंका में बहुत लोकप्रिय है। कुट्टू वरिसाई (kuttu varisai) चीन देश की ‘कुंगफू’ और जापान देश की ‘कराटे’ की ही तरह खेली जाने वाली कला है। यहाँ हम ‘सिलमबम (silambam)’ एवं ‘कुट्टू वरिसाई (kuttu varisai)’ के इतिहास के विषय में यह भी बता रहे हैं। यह कला दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व से लेकर पंद्रहवीं शताब्दी तक भारत के तमिलनाडु प्रदेश में बनी रही। इस कला का सृजन भी ‘मुनि अगस्त्य जी’ द्वारा रचित ग्रन्थ से ही माना गया है। इस कला के सृजन से जुड़े कुछ जीवंत प्रमाण ‘चोल’ एवं ‘चेर’ वंश के राजाओं एवं उनके वीर सैनिकों की मुर्तियों में देखने को भी मिलते हैं। इन प्राचीन मूर्तियों में चोल-चेर वंश के सैनिकों को एवं विभिन्न देवी-देवताओं को भी कुट्टू वरिसाई (kuttu varisai) की युद्ध-शैली की मुद्राओं में देखा गया है। इसी से इस कला के उस समय भी विद्यमान होने के ठोस प्रमाण मिलते हैं।  

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किन जंगली जीवों से प्रेरित है कुट्टू वरिसाई की युद्धकला शैली? (which wild creatures are inspired by Kuttu Varisai’s war style?)

कुट्टू वरिसाई (kuttu varisai) को सीखते समय कड़ी शारीरिक मेहनत के साथ-साथ कई वर्षों का गहन अभ्यास करना पड़ता है। इस अभ्यास की शुरुआत लगभग 10 वर्ष की आयु से ही शुरू कर दी जाती है, क्योंकि बचपन में हमारा शरीर अधिक लचीला और फुर्तीला होता है। इस आयु में जैसा चाहें वैसा ही अभ्यास किया जा सकता है। यह कला जंगल में रहने वाले जानवरों, जैसे कि – शेर, बाघ, चीता, हाथी, सांप, बाज़ और बन्दर की स्वयं को शत्रु से बचाने एवं शिकार करने की क्रियाओं एवं विधिओं पर आधारित है। इस कला में हाथों एवं पैरों दोनों का ही एक साथ प्रयोग किया जाता है। इस कला में शिक्षार्थी को प्रारंभ में ‘कालदी’ (जो कि ‘सिलमबम (silambam)’ कला का प्रारम्भिक चरण है) की कुछ क्रियाओं को करना सिखाया जाता है। इसमें ‘श्वास-अभ्यास’ (सांस रोकने एवं लेने की एक क्रिया), कलाबाजी, दौड़ लगाना आदि का अभ्यास कई घंटों तक लगातार कराया जाता है। शारीरिक संतुलन को बनाये रखने के लिए कई प्रकार की कठिन योग क्रियाएँ भी करवाई जाती हैं। इस कला में शरीर के हर हिस्से – कोहनी, मुट्ठी, पैर और घुटनों को कठोर बनाया जाता है, ताकि घातक प्रहार करके प्रतिद्वंदी को धराशाई किया जा सके।

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वर्तमान काल में कुट्टू वरिसाई (kuttu varisai in present day)   

कुट्टू वरिसाई (kuttu varisai) आज भी दक्षिण भारत में तमिलनाडु और श्रीलंका में परम्परागत युद्धकला एवं एक खेल के रूप में प्रचलित है। आज भी तमिलनाडु में बचपन से ही लोग अपने बच्चों को इस कला को सीखने के लिए प्रेरित करते हैं। तमिल के कुछ विद्यालयों में आज भी यह कला सिखाई जाती है।    

मित्रो कुट्टू वरिसाई एक दक्षिण भारतीय प्राचीन युद्धकला है। हमारे इस लेख में दी गयी जानकारी पढ़कर आपको कैसा लगा। यदि आपके पास भी इस कला से जुडी कोई जानकारी है तो हमारे साथ शेयर करें।

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भारतीय युद्ध कलाओं में मेरी रुचि शुरू से ही काफी रही है। घर की दीवार पर टंगा नॉनचक मुझे हमेशा चिढ़ाता रहता है। अलग अलग मार्शल आर्ट्स के बारे में जानने की ललक मुझमें हमेशा से ही रही। कई अलग अलग मार्शल आर्ट्स के बारे में मैं अक्सर रिसर्च करता रहता हूँ। जब भी कुछ नया सामने आता है तो कोशिश करता हूँ कि उसे एक लेख के रूप में पिरो कर आपके सामने रखूँ। इसमें युद्ध कलाओं की अधिकता होती है लेकिन इसके अलावा भी अगर मुझे कुछ लिखने का मौका मिले तो मैं चूकता नहीं।