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जो बोया है वही काटना पड़ता है, यही नियम कर्मों पर भी लागू होता है

कर्मों का फल हमें अवश्य मिलता है, जैसे भी कर्म किये होंगे वैसा ही फल भी मिलेगा। आधुनिक होने के चक्कर में इस सत्य को मत भूल जाना। 

हमारे पुरातन धर्म शास्त्रों-पुराणों में भी कर्म फल का बड़ा ही विस्तृत वर्णन किया गया है। उनके अध्ययन के अनुसार यह कर्म तीन प्रकार के होते हैं

मित्रो! हम अपने मानव जीवन में जैसे कर्म करते हैं। उनका वैसा ही फल हमको इस जीवन में भोगना पड़ता है।

लेकिन हम इस बात को समय से समझ नहीं पाते। जब तक हमें इस बात का बोध होता है कि हमने जो भी कर्म किये हैं उनका परिणाम क्या होगा? तब तक समय बहुत अधिक बीत चुका होता है। आइये आज हम जानते हैं कि यह कर्म कितनी प्रकार के होते हैं।  

हमारे भारत में कई महापुरुषों ने कर्म के विषय में कई शोध किये हैं। हमारे पुरातन धर्म शास्त्रों में भी कर्म फल का बड़ा ही विस्तृत वर्णन किया गया है। उनके अध्ययन के अनुसार यह कर्म तीन प्रकार के होते हैं:-

कर्मों का फल आधारित है इन 3 प्रकार के कर्मों पर:

1 क्रियमाण कर्म: 

मानव जीवन में नित्य प्रति जो कर्म सुबह उठने से लेकर दिन भर कुछ भी क्रिया-कलाप या कर्म किये जाते हैं। उन्हें क्रियमाण कर्म कहा जाता है। क्योंकि इन कर्मो के करने से मानव जीवन गतिमान रहता है। क्योंकि मुर्दा या निर्जीव वस्तुएं कर्म करने में समर्थ नहीं हो सकती। नित्यप्रति कर्म करना हर जीव का कर्तव्य है। कोई भी व्यक्ति अपनी बुद्धि के अनुसार कैसे भी कर्म कर सकता है। लेकिन यह क्रियमाण कर्म उसके जीवित होने और एक गतिशील आत्मा के होने का आभास कराते हैं। इस प्रकार से किये जाने वाले नित्य कर्मों का फल अधिकांश साथ-साथ ही प्राप्त हो जाता है। जैसे यदि आप भोजन को ग्रहण कर लेंगे तो आपकी भूख स्वतः ही शांत  हो जायेगी।

यदि आप स्नान कर लेंगे तो आपकी देह स्वच्छ हो जायेगी और आपको स्फूर्ति एवं सुख का अनुभव होगा। इन कर्मो को करने के लिए आपको कोई अतिरिक्त शक्ति का उपयोग नहीं करना पड़ता। जैसे कि दिन भर की थकान के बाद आपको निद्रा अपने आप ही आ जायेगी। आपकी थकान के उतर जाने पर आप स्वयं ही उठ जायेंगे। किन्तु यदि आप आलस्य को धारण कर लेंगे तो आपका यह कर्म आपको जीवन की गति से दूर ले जाएगा। आपको इसके दुष्परिणाम भी भुगतने पड़ेंगे। इस प्रकार से किये जाने वाले कर्म क्रियमाण कर्म कहलाते हैं।

कर्मों का फल हैं ये 4 प्रकार के पुत्र

2 संचित कर्म: 

यह बात तो निश्चित हो चुकी है कि आपको कर्म तो करने ही पड़ेंगे। कुछ ऐसे कर्म भी होते हैं, जो कि हम करते तो हैं। लेकिन हमें उस समय यह ज्ञात नहीं हो पाता कि इन कर्मों का परिणाम क्या होगा। इस प्रकार से हम कुछ ऐसे कर्म भी करते हैं जो हमारी दृष्टि से बिलकुल सही एवं सटीक होते हैं। किन्तु प्रकृति, समाज एवं अन्य प्राणियों के दृष्टिकोण से उचित नहीं होते।

हम यह अक्सर यह सोचते रहते हैं, कि हमने जो भी किया उसका हमें अच्छा ही परिणाम मिलेगा। लेकिन कई बार ऐसा नहीं होता, और हमें अपनी कर्म करने की सोच में परिवर्तन लाना ही पड़ता है। इस प्रकार से कर्म करते हुए कुछ ऐसे कर्म भी होते हैं जो कि हमारे चित्त की अन्तर्दशा में जाकर एकत्र हो जाते हैं। साथ ही उन कर्मो का फल भी चित्त में ही विद्यमान हो जाता है। जब तक हमें अपने इन कर्मो का फल प्राप्त नहीं हो जाता। तब तक वह कर्म हमारे चित्त में भी समाहित रहते हैं। इस प्रकार के कर्मो को संचित कर्म (अर्थात संचय कर रखे गये कर्म) कहा जाता है। 

3 प्रारब्ध कर्म:

जब हमारे कर्म हमें उस दिशा की और ले जाते हैं, जहाँ हमारे कर्म हमें पूर्ण रूप से फल देने को परिपक्व हो चुके होते हैं। तब ही इन कर्मो का फल हमें मिलता है। इस प्रकार के कर्मों को प्रारब्ध कर्म कहा जाता है। इस प्रकार के कर्म हमारे अंतर्मन में लम्बे अंतराल के लिए एकत्र रहते हैं। यह कर्म कई दिन, कई माह, कई वर्षों तक अर्थात पंद्रह साल, तीस साल, पचास साल, सौ साल या कई जन्मों (जब तक एक देह में एक आत्मा का वास है) तक भी हमारे भीतर ही विद्यमान रह सकते हैं।

इन कर्मो में अच्छे एवं बुरे दोनों ही प्रकार के कर्मों का समूह होता है। जिस प्रकार से हम अपने दैनिक जीवन में एक ही दिन में कई प्रकार के कर्म कर लेते हैं। जिनमें से कुछ कर्म हमारे संचित कर्मों में समाहित होकर अनंत काल के लिए विलीन हो जाते हैं। इस प्रकार से किये गए कर्मों का एक बड़ा भाग लाखों की संख्या में संचित कर्मों के एक विशाल समूह का रूप धारण कर लेता है। इस तरह से यदि हम विचार करें तो पायेंगे कि हम अपने एक मानव जीवन में लाखों संचित कर्मों को एकत्रित कर लेते हैं।

यदि हम अपने पूर्व जन्म के कर्मों को भी इन में सम्मिलित कर लें, तो हमें ज्ञात होगा कि ऐसे बहुत सारे अनगिनत कर्म अभी बाकी हैं। जिनको भोगना अभी शेष है। ताकि उनका कर्म फल हमें प्राप्त हो सके। हमारे शास्त्रों में एक प्रकार के ज्ञान योग का भी वर्णन किया गया है। जैसे ही मनुष्य साधना शैली के द्वारा इस ज्ञान योग को सिद्ध कर लेता है। उसी समय उसके जीवन में से प्रारब्ध कर्म समाप्त हो जाते हैं। और ऐसा आभास होता है कि वर्षों तक अंधकार में कैद रहने के बाद एक प्रकाशमय दीपक की रौशनी से जीवन जगमग सा हो उठा है। ऐसे कर्मों को आध्यात्मिक व्याकरण भाषा में प्रारब्ध कर्म कहा जाता है।                      

मित्रों अपने इस लेख के द्वारा हमने आपके सामने कर्मफल के सिद्धांत एवं कर्मों के प्रकार के विषय में कुछ जानकारी प्रस्तुत की है। भगवान् श्रीकृष्ण जी ने भी श्री मद भागवत गीता में कहा है कि : 

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।

मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि ॥ ४७ ॥

अर्थात हे मनुष्य तू फल की चिंता कर्म बिना किये जा, तुझे तेरे किये हुए कर्मो का फल अवश्य ही प्राप्त होगा 

यदि आप भी इस विषय में अपने विचार देना चाहते हैं, तो कमेन्ट बॉक्स में अवश्य लिखें।

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