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एक खिलाडी कलारिपयाट्टू का प्रदर्शन करते हुए,

नृत्यकला से जुड़ी एक अनूठी युद्धकला कलारीपयट्टु: (Kalaripayattu, a unique artistic warfare associated with choreography)

भारत में कई प्रकार की युद्ध कलाएं प्रचलित हैं। जिनमें से भारत के दक्षिणी राज्य से जुड़ी एक युद्ध कला जिसका नाम “कलारीपयट्टु” (kalaripayattu) है, विश्व प्रसिद्ध है। इस कला में शस्त्रकला के प्रयोग के साथ-साथ हाथों और पैरों का भी अद्भुत प्रयोग किया जाता है। यह कला भी मल्लयुद्ध की ही भांति प्राचीन निर्धारित शैलियों पर आधारित है। इस कला के युद्ध अभ्यासों को नृत्यकला की तरह की जाने वाली कला भी कहा जाता है। कुछ इतिहासकारों का मत है कि जो लोग कथकली (एक दक्षिण भारतीय नृत्यकला) को जानते थे। वह भी इस कला में अन्य योद्धाओं से बेहतर पारंगत थे। आज भी केरल और तमिलनाडु के कुछ विद्यालय इस कला को व्यायाम के तौर पर प्रयोग करते हैं।

किन महान देवताओं से जुडी है ये कला? (What is this art related to the great deities?)

यह कला मूल रूप से केरल और तमिलनाडु में पनपी, फली-फूली और आज भी परम्परा के रूप में जीवंत है। कलारीपयट्टु भी भारत की अन्य युद्ध कलाओं की तरह ही आत्मरक्षा, युद्ध एवं व्यायाम का एक उत्तम साधन है। साथ ही यह कला नृत्यकला से भी अभिन्न रूप से जुड़ी हुई है। इस कला ने दक्षिण भारतीय इतिहास में एक लम्बे अंतराल तक अपना वर्चस्व बनाये रखा। भारतीय युद्धकला के महान ज्ञाता ‘बोधिधर्म’ ने भी इस कला का काफी प्रचार एवं प्रसार किया। प्राचीन धर्मग्रंथों के अनुसार इस कला के रचनाकार भगवान् शिव, मुनि अगस्त्य एवं भगवान् परशुराम जी को माना जाता है।  

एक महान ऋषि से जुडी युद्धकला सिलाम्बम (silambam)

कलारीपयट्टु का शाब्दिक अर्थ: (Kalaripayattu’s literal meaning)

इस शब्द का संधि विच्छेद करें तो पता चलता है कि ये नाम दो शब्दों कलारी + पयट्टु से मिलकर बना है। कलारी मलयालम भाषा का एक शब्द है जिसका अर्थ है विद्यालय या व्यायामशाळा। दूसरा शब्द पयतु जिसका अर्थ है युद्धकला का अभ्यास, व्यायाम करना या कड़ी शारीरिक मेहनत करना। अर्थात युद्धकला के विद्यालय में कठिन शारीरिक व्यायाम करते हुए इस कला का अध्ययन करना। इस शब्द का उद्गम काल बीसवीं शताब्दी की शुरुआत में मलयालम रंगमंच से जुड़े एक कलाकार ‘श्री उल्लूर एस. परमेश्वरा अय्यर जी‘ के एक नाटक जिसका नाम ‘अम्बा’ था, में हुआ था। इस नाटक में भी इस प्रकार की युद्धकला का प्रयोग किया गया था।

क्या है कलारीपयट्टु की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि? (What is the historical background of Kalaripayatu?)

दक्षिण भारत के लोकगीतों में भी इस कला के सृजन का श्रेय हिन्दू देवी-देवताओं को ही दिया गया है। इन गीतों में देवताओं के शस्त्रों की उपमा देकर मनुष्य को आत्मरक्षा, सामाजिक सुरक्षा एवं शक्तिशाली बनकर संघर्ष करने की प्रेरणा दी जाती रही है। दक्षिण के कुछ इतिहासकारों के अनुसार यह कला लगभग 3000 साल पुरानी और 12वीं सदी के समय की मानी जाती है। 11 वीं शताब्दी में चेर और चोल वंश के राजाओं ने भी अपनी सेना को इस युद्धकला को सिखाया था। यह कला 9वीं सदी में और भी ज्यादा विकसित हुई और केरल के ‘नायर समुदाय’ के योद्धाओं ने इस कला का बहुत अधिक प्रचार एवं प्रसार किया।

चोल वंश की अद्भुत युद्धकला – कुट्टू वरिसाई

क्या है कलारीपयट्टु की युद्धशैली? (What is the style of Kalaripayattu?)

इस कला को सीखने वाले योद्धाओं को 7 वर्ष की आयु से ही इस कला की शिक्षा लेने हेतु विद्यालयों में भेज दिया जाता है। जहाँ पर उन्हें शारीरिक व्यायाम के साथ-साथ चुस्ती-फुर्ती और कौशल के कई गुर सिखाए जाते हैं। इस कला में मुख्य रूप से उन्हें नृत्य करना, धरती पर कई प्रकार से घूमना, पलटना, ऊंची छलांग भरना और कई प्रकार से छलांग भरते हुए शस्त्रों का प्रयोग करना सिखाया जाता है। इस कला में लाठी, भाला, तलवार-ढाल के अलावा धनुष-बाण का भी प्रयोग किया जाता है। इस कला को सीखने में कई वर्षों का समय और कड़ी मेहनत करनी पड़ती है।

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