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कैसे हुआ आयुर्वेद का जन्म?

“जिसमें आयु के हित-अहित और व्याधि के निदान और शमन का ज्ञान हो उसे आयुर्वेद कहते हैं.”

शरीर और जीव के योग को जीवन कहते हैं। शरीर से जीव के अलग हो जाने को ही मृत्यु कहते हैं। जिसके द्वारा मनुष्य स्वयं आयु को प्राप्त कर ले तथा दूसरे की आयु को भी ज्ञात कर ले। ऋषि मुनियों की दृष्टि में वही आयुर्वेद कहलाता है। आइये हम इस भेद को जानने का प्रयत्न करें कि कैसे हुआ आयुर्वेद का जन्म? आयुर्वेद का ज्ञान होने पर मनुष्य भक्ष्य-अभक्ष्य में अंतर कर पाता है एवं भक्ष्य का सेवन कर अभक्ष्य का त्याग करता है।

आयुर्वेद का जन्म अचानक नहीं हो गया। वास्तव में आयुर्वेद, ज्ञान की एक लम्बी यात्रा कही जा सकती है। सबसे पहले ब्रह्माजी ने प्रजा के हित के लिए एक लाख श्लोकों की ब्रह्म संहिता लिखी, तथा इसका ज्ञान अपने पुत्र दक्ष को दिया। दक्ष ने ये ब्रह्म-संहिता सूर्य पुत्र अश्विनी कुमारों को प्रदान की और उन्हें इसका अध्ययन कराया। अश्विनी कुमारों ने इसके पश्चात् ‘अश्विनी कुमार संहिता’ का सृजन किया और फिर अपने इसी ज्ञान के बल पर कई चमत्कारिक उपचार किये।

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अश्विनी कुमारों ने किये ये उपचार

  • एक युद्ध में भैरव द्वारा काटे गए ब्रह्मा जी के सर को फिर से जोड़ दिया।
  • देवताओं और राक्षसों के युद्ध में अंग-भंग हुए देवताओं को फिर से ठीक कर दिया।
  • पूषा देवता के दांत जोड़ दिए।
  • भाग देवता के नेत्र ठीक किये।
  • वृद्ध च्यवन ऋषि को युवा बनाया।

अपने इन्हीं कार्यों के कारण अश्विनी कुमारों को देवता की तरह पूज्य माना गया तथा वह वैद्य शिरोमणि कहलाये।

अश्विनी कुमारों ने आगे बांटा ज्ञान

अश्विनी कुमारों ने अपने इस ज्ञान को केवल अपने तक ही सीमित नहीं रखा बल्कि कैसे हुआ आयुर्वेद का जन्म? देवराज इंद्र को इसकी शिक्षा दी। इंद्र ने भी आगे अत्रि आदि मुनियों को इसका ज्ञान दिया। अत्रि मुनि ने अपने नाम से ‘आत्रेय-सहित’ लिखी और अग्निवेश, भेद, जातुकर्ण, पराशर आदि ऋषियों को इसकी शिक्षा दी।

ऋषियों ने देवराज इंद्र से लिया ज्ञान

ऐसा भी कहा जाता है कि एक बार कहीं हिमालय के पास मुनि भारद्वाज तथा अन्य कई ऋषि मुनि एकत्र हो विचार कर रहे थे। कि सभी प्रकार के कर्म करने का साधन यह शरीर ही है। इसलिए हमें इसे निरोगी रखने का प्रयास करना चाहिए और इसके लिए इंद्र से आयुर्वेद संहिता लायी जाये। तब मुनि भारद्वाज जी इन्द्र के पास गए और आयुर्वेद की शिक्षा प्राप्त की। तत्पश्चात वापिस आकर सभी ऋषियों को इसका ज्ञान दिया।    

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चरकसंहिता एवं शेष जी

जब ब्रह्मा जी ने वेदों की रचना की तो शेष जी अथर्ववेद के अंग आयुर्वेद का ज्ञान लिए पृथ्वी पर गुप्त रूप से भ्रमण करते रहे और सेवक की तरह रोगियों को आरोग्य प्रदान करते रहे। इसी दौरान उन्होंने चरक-संहिता लिखी।

काशीपुर में धन्वन्तरी एवं सुश्रुत  

देवराज इंद्र की इच्छा के अनुसार ही लोगों के भले के लिए धन्वन्तरि काशीपुर में हुए और काशीनरेश दिवोदास के नाम से रोगियों का उपचार करते रहे। इस दौरान उन्होंने धन्वन्तरी संहिता भी लिखी।

जब ऋषि विश्वामित्र को ये ज्ञान हुआ की काशी के राजा दिवोदास स्वयं धन्वन्तरी के अवतार हैं, तो उन्होंने अपने पुत्र सुश्रुत को उनके पास भेजा ताकि वह राजा दिवोदास से आयुर्वेद की शिक्षा प्राप्त कर सके। सुश्रुत के साथ साथ अन्य सौ मुनियों ने भी दिवोदास धन्वन्तरी से आयुर्वेद की शिक्षा ग्रहण की।

इसी प्रकार आयुर्वेद का विस्तार हुआ। किन्तु इसका अधिकतर साहित्य लुप्त हो जाने के कारण आज आयुर्वेद के विषय में ज्ञान सीमित हो गया है। किन्तु आयुर्वेद से सम्बंधित हो रहे अनुसन्धान आज भी धीरे धीरे कई रहस्य खोल रहे हैं, कि कैसे हुआ आयुर्वेद का जन्म? एवं अपने गौरव को पुनः प्राप्त कर रहा है। हम आशा कर सकते हैं कि आने वाले समय में आयुर्वेद जन-जन को निरोग बनाने में अपना पूरा योगदान दे पायेगा।

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परमपिता परमात्मा शिव की कृपा से वैद्य पण्डित बीरबल कुमार शर्मा पिछले 45 वर्षों से आयुर्वेदिक औषधियों से रोगियों का इलाज कर रहे हैं। अपने स्वर्गीय पिता वैद्य पंडित केशो लाल शर्मा जी के मार्गदर्शन में कई औषधियों का निर्माण भी किया। कई रोगियों के असाध्य कष्टप्रद रोगों को अब तक दूर कर चुके हैं, जैसे बवासीर, गर्भाशय का कैंसर, मधुमेह, अस्थमा इत्यादि। एक अच्छे वैद्य होने के साथ साथ वैद्य पण्डित बीरबल कुमार शर्मा जी एक अच्छे लेखक भी हैं और हिंदी के साथ साथ पंजाबी पर भी अच्छी पकड़ रखते हैं।

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