ललही छठ पूजा विधि एवं कथा

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हलछठ देवछठ तिनछठ पूजा विधि एवं कथा

बलराम जी से कैसे जुड़ा है छठ पर्व ? (how is chatth festival associated with balram ji?)

इस व्रत को उत्तर प्रदेश और बिहार राज्य में अधिक महत्व दिया गया है। और यहीं के लोग इसे अधिकतर मानते हैं। भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष को हलछठ मनाया जाता है। इस व्रत को अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग नामों से जाना जाता है।

  1. हलछठ
  2. देवछठ
  3. तिनछठ
  4. ललही छठ आदि।

इस व्रत को स्त्रियां अपने बेटे की दीर्घायु के लिए करती हैं। ऐसा माना जाता है कि इस दिन भगवान श्री कृष्ण के भाई बलराम जी का जन्म हुआ था। बलराम जी का मुख्य शस्त्र हल होता है। इसलिए इस व्रत वाले दिन हल का बोया हुआ अन्न, सब्जियां खाना वर्जित माना जाता है। कुछ लोग इस दिन माता सीता का जन्म दिन भी मानते हैं।

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अपने पुत्र की लंबी आयु के लिए हलछठ व्रत तथा पूजा करती महिलाएं

कौन करता है यह व्रत? (who makes this fast?)

यह व्रत वह स्त्री करती हैं जिनके पुत्र होते हैं। तथा जिनकी पुत्रियाँ ही संतान होती हैं, वह स्त्रियां इस व्रत को नहीं करती हैं अपने पुत्र की लंबी आयु के लिए इस व्रत को किया जाता है।

पूजा करने की सामग्री (worshiping material)

महुआ का पत्ता, तालाब में उगा हुआ चावल, इसको तिन्नी का चावल बोलते हैं। भुना हुआ चना, घी में भुना हुआ महुआ, अक्षत, लाल चंदन, मिट्टी का दीपक, भैंस के दूध से बनी दही तथा घी। सात प्रकार के अनाज, धान का लावा, हल्दी, नया वस्त्र, जनेऊ और कुश। यह सारे सामान इस व्रत की पूजा में रखे जाते हैं। कहा जाता है कि इस व्रत में पूजा की सभी सामाग्रियां छः की संख्या में होनी चाहिए इस व्रत में हलछठ की कहानियां भी 6 की मात्रा में सुनाई जाती है।

हरितालिका तीज व्रत का महत्व

पूजा की विधि (method of worship)

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हलछठ, देवछठ या तिनछठ के इस त्यौहार की पूजा से पूर्व इसकी पूजा सामग्री तथा पूजा विधि की जानकरी अवश्य ले लेनी चाहिए।

सुबह प्रातः काल जल्दी उठकर महुआ की दातुन करने के पश्चात स्नान करें। तत्पश्चात पूजा में लगने वाली सारी सामग्री एकत्रित करें। देखा जाता है कि, कुछ स्थानों पर लोग इस व्रत को दोपहर में करते हैं। तो वहीँ कुछ स्थानों पर लोग इस व्रत को शाम को करते हैं। इस व्रत की पूजा पूर्ण होने से पहले स्त्रियाँ जल का पान नहीं करती हैं। अर्थात पूजा होने तक निर्जला व्रत रखती हैं। इस व्रत की पूजा करने के लिए यदि तालाब का किनारा मिल जाए तो अच्छा होता है। अगर तालाब का किनारा ना भी मिले तो किसी साफ़ स्थान का चुनाव करें। और अच्छे से मिट्टी से लीप लें, और छोटा सा मिट्टी का ही तालाब बना लें। उसमें पानी भर लें। फिर कुश, पलाश, झरबेरी की डाली को बांधकर हरछठ बनाएं। फिर इसी के पास मिट्टी से गौरी, गणेश, शिवजी तथा कार्तिकेय की प्रतिमा बनाकर स्थापित करें। सभी देवताओं को प्रणाम करें। फिर हरछठ को जनेऊ से बांधें। भैंस के घी में सिंदूर मिलाकर हलछठी माता का चित्र बनाएं। सुहाग की समस्त सामग्री चढ़ाएं, और अपनी परंपरा के अनुसार कथा और पूजा करें।

 

हलछठ व्रत की कथा (Story of halchat fast)

बहुत पुराने समय की बात है। चंपावती नगर में विद्यावती नाम की एक स्त्री अपने बेटे सोनू के साथ रहती थी। वह एक सेठ जी के घर में काम करके अपना जीवन यापन करती थी। हलछठ का व्रत आया, सब व्रत करने वाली स्त्रियों की तरह विद्यावती ने भी अपने पुत्र की लंबी आयु, एश्वर्य और उन्नति के लिए इस व्रत को किया। इस व्रत को ताजे भोजन खा कर खंडित करते हैं। किंतु विद्यावती ने भूलकर बासी तथा ठंडा भोजन ग्रहण कर लिया। इससे तिलछठी माता नाराज हो गई। जिससे उन्होंने एक अजगर को संकेत किया कि, इनके पुत्र को वह निगल जाए। फिर अजगर ने ऐसा ही किया। विद्यावती पूरे दिन अपनी बेटे का इंतजार करती रही, और उसको ढूंढती रही। फिर भी उसका कोई पता नहीं चला। वह उदास होकर बैठी हुई थी। तभी छठी माता एक वृद्धा के रूप में आई। उन्होंने विद्यावती से कहा  कि तूने जो तिलछठी के व्रत के बाद बासी और ठंडा भोजन किया था। उसी के कारण तेरे पुत्र को अजगर ने निगल लिया है। विद्यावती यह सुनकर हैरान हो गई। वह बोली हे माता मुझसे भूल हो गई मैंने यह सब कुछ जानकर नहीं किया है। मैंने बासी भोजन भूल से ग्रहण कर लिया था। हे माता अब आप मुझे ऐसा उपाय बताइए जिससे हमारे पुत्र की रक्षा हो सके। वृद्धा ने कहा अगले वर्ष की छठी व्रत को विधि-विधान से करना। और उसका खंडन ताजा तथा गर्म भोजन ग्रहण करके करना। भोजन की गर्मी से अजगर के अंदर गर्मी पहुंचेगी और तुम्हारे पुत्र को वह बाहर उगल देगा। यह सब बता वह वृद्ध स्त्री अंतर्ध्यान हो गई। फिर विद्यावती ने एक साल का इंतजार किया। एक वर्ष के बाद विद्यावती ने तिलछ्ठी माता की पूजा विधि पूर्वक की। और व्रत का खंडन भी ताजा और गर्म भोजन के साथ किया। और उनकी भोजन की गर्मी से अजगर के पेट में गर्मी उत्पन्न हुई। जिससे अजगर ने विद्यावती के पुत्र को उगल दिया। पुत्र बाहर आया और अपने आप को सही सलामत पा कर के अत्यधिक प्रसन्न हुआ और घर लौट आया। विद्यावती पुत्र को सही सलामत देखकर बहुत ही प्रसन्न हुई। विद्यावती ने छठी माता को प्रणाम किया और हर साल हर छठ के व्रत को विधि पूर्वक करने लगी।

सोलह सोमवार व्रत से जुड़ी एक पौराणिक कथा

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हलछठ, देवछठ या तिनछठ के इस व्रत के अवसर पर विधि पूर्वक पूजा करने से जिनकी संतान नहीं है, उनको श्रेष्ठ तथा दीर्घायु संतान की प्राप्ति होती है। ऐसी मान्यता है।

अतः छठ पूजा के बाद माता रानी की कथा सुनने का विधान होता है। इस प्रकार छठ की 6 कथाएं पूजा में कहीं जाती हैं। उसके बाद आरती की जाती है। वही पूजा के स्थान पर बैठकर महुए के पत्ते पर महुए का फल प्रसाद रखा जाता है। तत्पश्चात भैंस के दूध से बना हुआ दही मिलाकर साथ में खाया जाता है। इस दिन व्रत करने वाली स्त्रियां किसी और आहार का सेवन कर सकती हैं। इस व्रत में गाय के दूध-दही, घी का सेवन वर्जित होता है। सिर्फ भैंस का दूध-दही, घी खाने का नियम है। व्रत के दिन नीके (तिन्नी) चावल में घी तथा घर के सामने उगा हुआ नींबू का पेड़ अगर हो तो उस पेड़ का फल नींबू मिलाकर खा सकते हैं। भुना हुआ महुआ खा भी  सकते हैं।

हलछठ व्रत का महत्व (importance of

halchat fast)

कहा जाता है कि, इस प्रकार विधि पूर्वक पूजा करने से जिनकी संतान नहीं है, उनको श्रेष्ठ तथा दीर्घायु संतान की प्राप्ति होती है। इस व्रत के पूजन से संतान की आयु एश्वर्य में वृद्धि होती है। तथा पुत्र की आकस्मिक मृत्यु होने की संभावना भी कम हो जाती है। ऐसा कहा जाता है कि जब भी बच्चा पैदा होता है। तब से 6 महीने तक छठी माता उसका देखभाल करती हैं, उसका पूरा ध्यान रखती हैं। इसलिए बच्चे के जन्म के 6 दिन बाद से ही छठी माता की पूजा भी की जाती है।

हलछठ व्रत के दिन होती है बैल की पूजा (on the day of fasting, worship of bulls)

कई जगहों पर किसानों के घर में भी इस दिन बैल तथा उसके हल की पूजा की जाती है। क्योंकि इस दिन बलराम जी का जन्म हुआ था और उनका शस्त्र हल है। इसलिए उनके हल की पूजा की जाती है। इसी दिन स्त्रियां अपने पुत्र की रक्षा के लिए पूरे दिन व्रत रखती हैं।

इस वर्ष 2018 में हर छठ कब मनाई जाएगी (when will this year be celebrated in 2018)

2018 में मलिन मास आ जाने के कारण सारे त्यौहार एक महीने की देरी से आएंगे। छठ का त्यौहार 1 सितंबर 2018 दिन शनिवार को मनाया जायेगा।

ऐसे मनाया जाता है नाग पंचमी का त्यौहार

By विभा पाण्डेय

यदि मन में कुछ करने की इच्छा हो तो कोई रोक नहीं सकता। हाँ बाधाएं तो आएंगी ही किन्तु बाधाएं मात्र वो सीढ़ी हैं जिन पर पैर रख कर हमें ऊपर उठना है। जिनके पार सफलता दिखाई देती है। हाउसवाइफ होते हुए भी मैंने जब ये ठान ली की कुछ करना है तो मुझे घर छोड़ कर बाहर निकलने की आवश्यकता नहीं पड़ी। अवसर मेरे सामने आया और मैंने उसे गंवाया नहीं और जुड़ गई 13th टीवी के साथ

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