धनतेरस की कथाएं

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    धनतेरस से जुड़ी पुराणिक कथाएं

    धनतेरस पर्व से जुड़ी कथायें (Stories related to Dhanteras festival)

    धनतेरस का त्यौहार सम्पूर्ण भारत में कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी के दिवस को मनाया जाता है। शास्त्रों के अनुसार इस दिन भगवान् धन्वन्तरि जी का जन्म हुआ था। इस पर्व पर लक्ष्मी जी, गणेश जी के साथ-साथ कुबेर जी कि पूजा भी की जाती है। आज हम आपको धनतेरस से जुडी कथाएं जो कि हमें इस त्यौहार के इतिहास से अवगत कराती है। आइये इस पावन पर्व के इतिहास के विषय में जानते हैं।

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    धनतेरस की पहली कथा (Dhanteras’ first story)

    महाराज हिमा का पुत्र 16 वर्ष का हो चुका था। बहुत पहले ही उनके पुत्र के विषय में यह भविष्यवाणी हुई थी। कि महाराज हिमा के पुत्र की जब शादी होगी तो विवाह के चौथे दिन उनके पुत्र की मृत्यु हो जाएगी। हिमा की पुत्र वधू को यह सारी बातें पता थी। बहुत ही चतुराई से उस आखिरी दिन उसने अपने पति को सोने नहीं दिया। अपने सारे गहने और जेवरात को इकट्ठा करके अपने कमरे के द्वार पर ढेर लगा दिया। तथा कमरे के चारों तरफ मिट्टी के दीपक को जला कर रख दिया। यमराज सांप के वेश में आए और कमरे तक पहुंचते ही सांप की आंखें चकाचौंध हो गई। उस यमराज की बहुत कोशिश करने के बावजूद भी जेवरात के चमक तथा दीपक की रोशनी की चकाचौंध की वजह से यमराज अंदर प्रवेश नहीं कर पाए। और पूरी रात बाहर ही गुजार दी। फिर अगली सुबह खाली हाथ यमलोक पहुंच गए। इसी तरह उसने अपने पति की जान की रक्षा की तभी से यह दिन धनतेरस के रूप में मनाया जाने लगा।

    धनतेरस की दूसरी कथा  (Second story of Dhanteras)

    देवताओं को राजा बलि के प्रकोप से मुक्ति दिलाने के लिए भगवान विष्णु वामन का रूप रखकर राजा बलि के यज्ञ भूमि पर पहुंच गए। वहां राक्षसों के गुरु शुक्राचार्य ने भगवान विष्णु को वामन रूप में पहचान लिया। और बलि से अनुरोध किया कि यह साक्षात भगवान विष्णु है। यह कुछ भी मांगे तो इनको देने से इंकार कर देना। क्योंकि यह तुमसे सब कुछ मांगकर तुम्हें निसहाय करके तुम्हें परास्त करने आए हैं। बलि ने शुक्राचार्य की बातों को अनसुना कर दिया। जब वामन भगवान ने उनसे तीन पग भूमि मांगी तो राजा बलि ने अपने कमंडल से जल निकाल कर संकल्प लेने लगे । तत्पश्चात गुरु शुक्राचार्य ने उन्हें रोकने के लिए लघु रूप में कमंडल में आकर खड़े हो कर जल निकलने के मार्ग को बंद कर दिया। वामन भगवान शुक्राचार्य की इस चाल को समझते हुए अपने हाथ में रखे हुए कुश से शुक्राचार्य की एक आंख फोड़ दी। शुक्राचार्य छटपटा कर कमंडल से बाहर निकल कर आ गए फिर बलि ने तीन पग भूमि दान करने का संकल्प लिया। फिर भगवान वामन ने एक पद से पूरी पृथ्वी को नाप लिया। तथा दूसरे पग से अंतरिक्ष को। तीसरे पग के लिए स्थान ना होने के कारण बलि ने अपना सर भगवान के चरणों में रख दिया। जिससे बली निसहाय हो गए उनके पास कुछ भी नहीं बचा। सब कुछ गवां बैठे इससे देवताओं को मुक्ति मिल गई। जो धन संपत्ति देवताओं से छीनी गई थी उससे कई गुना अधिक संपत्ति देवताओं को वापस मिल गई। इसी उपलक्ष में भी धनतेरस का यह त्यौहार मनाया जाने लगा।

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