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बोथाटी एक प्राचीन भारतीय युद्ध कला

क्या है बोथाटी? (what is bothati?)

बोथाटी वास्तव में घोड़े पर बैठ कर भाले से लड़ने की कला का एक रूप है। दूसरे शब्दों में बोथाटी वास्तव में घोड़े पर बैठ कर भाले से लड़ने का अभ्यास करने की एक विधि है। बोथाटी दरअसल उस भाले को कहा जाता है, जिससे इसका अभ्यास किया जाता है। बोथाटी एक प्राचीन भारतीय युद्ध कला है जिसे कि एक प्रकार से खेल की तरह भी खेला जाता है। यही कारण है कि इस अभ्यास विधि को भी बोथाटी ही कहा जाता है।

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कैसे खेला जाता है बोथाटी? (how bothati is played?)

प्राचीन काल में बोथाटी में भाग लेने वाले योद्धा घोड़े पर बैठ कर एक दूसरे की ओर घोड़ा दौडाते थे। घुड़सवारी करते हुए भाले के वार से एक दूसरे को घोड़े से गिराने का प्रयास करते थे। लेकिन कालांतर में इसका रूप बदल गया। जिसमें कि घुड़सवार अपने घोड़े को दौडाते हुए भाले की नोक से किसी चीज़ को चुभो कर उठा लेते हैं या किसी जगह पर निशाना बनाते हैं। पंजाब में वैसाखी के अवसर पर होने वाले मेले में गतका का प्रदर्शन करते गतका के अभ्यासी बोथाटी का भी प्रदर्शन करते हैं। इसमें उन्हें अपने भाले से पत्थरों के ढेर पर वार करना होता है। भाले पर एक कपडे की गेंद लगी होती है जिस पर रंग लगा होता है। वार कितना सटीक हुआ ये उस रंग की वजह से पता चल जाता है। इसके लिए भाले के प्रयोग में निपुणता के साथ साथ घुड़सवारी में भी व्यक्ति को दक्ष (perfect) होना चाहिए।

अपने समय में मराठे भी एक विशेष प्रकार के 10 फुट के भाले के प्रयोग के लिए जाने जाते थे और ये भाला बोथाटी ही था।

ऐसे हुआ युद्ध कलाओं का जन्म और विकास

बोथाटी का इतिहास (history of bothati)

इस कला के जन्म या इतिहास के विषय में कोई स्पष्ट जानकारी तो उपलब्ध नहीं है। किन्तु यदि इतिहास की बात करें तो कई ऐसे योद्धाओं का वर्णन मिलता है जो इस कला में निपुण थे। यदि महाभारत काल की बात करें तो युधिष्ठिर के विषय में ये जानकारी मिलती है की वे भाला चलने में निपुण थे। इसके साथ ही यदि शल्य चिकित्सा के पिता कहे जाये वाले शल्य भी भाला चलने के माहिर माने जाते थे। भगवान शिव के पुत्र कार्तिकेय के पास भी एक दिव्या भाला था जिसका नाम ‘वेल’ था। सिखों के पांचवें गुरु श्री गुरु अर्जुन देव जी भी भाला चलाने की कला में निपुण थे। इस अस्त्र का प्रयोग प्राचीन काल से ही होता रहा है। 

ये हैं प्राचीन भारतीय अदभुत युद्ध कलाएं