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ऐसे हुआ युद्ध कलाओं का जन्म और विकास...

क्या हैं युद्ध कलाएं? (what is martial art)

मार्शल आर्ट अर्थात युद्ध कला, या युद्ध का विज्ञान। यदि हम इस युद्ध कला या युद्ध के विज्ञान के विषय में बात करें तो आजकल ज्यातादर लोग मार्शल आर्ट का मतलब समझते हैं कि ये दो लोगों के बीच लड़ी जाने वाली लड़ाई का तरीका है। यानि द्वंद्व कला है। किन्तु ऐसा नहीं है, ये कला संघर्ष का विज्ञान है। अब ये संघर्ष चाहे सामने खड़े एक व्यक्ति से हो, किसी सेना की टुकड़ी से या जीवन की परिस्थितयों से। आइये जानते है कि ऐसे हुआ युद्ध कलाओं का जन्म और विकास…।

युद्ध कलाओं का इतिहास (history of martial arts)

यदि इसके इतिहास को किसी एक लेख में पिरोने का प्रयास किया जाये तो यह असंभव होगा। क्योंकि पूरे विश्व में अनगिनत युद्ध कलाएं हैं। उनमें से भी अधिकतर युद्धकलाओं के बारे में मिलने वाली जानकारी एकदम अधूरी और बिखरी हुई है। हम आपको यह बताने का एक छोटा सा प्रयास कर रहे हैं कि ऐसे हुआ युद्ध कलाओं का जन्म और विकास।

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युद्ध कलाओं का जन्म (birth of martial arts)

मार्शल आर्ट(martial art) या युद्धकला के उद्गम या जन्म के विषय में बुद्धिजीवियों के अलग-अलग विचार हैं जिनमें से एक मत यह है कि-

“असभ्य से धीरे-धीरे सभ्य होते चले गए मनुष्य ने स्वयं ही यह कला विकसित की थी”

इस मत के अनुसार यह युद्ध कला या मार्शल आर्ट पहले साधारणतया स्व-सुरक्षा यानि अपनी रक्षा करने की कला थी। जो कि धीरे-धीरे विकसित होती रही। लेकिन समय के साथ-साथ जब मनुष्य समूह बनाकर एक ही जगह पर स्थिर रूप से रहने लगा। उस समय धीरे-धीरे ये समूह बड़े होने लगे तो आत्मरक्षा की यह कला भी विकसित होकर युद्ध कला के रुप में परिवर्तित हो गई।

संघर्ष था युद्ध कलाओं का जन्मदाता (struggle was the mother of martial arts)

इस मत के अनुसार संघर्ष को ही युद्ध कलाओं का जन्मदाता कहा गया। सृष्टि के प्रारंभ से ही मनुष्य को ज़िंदा रहने के लिए संघर्ष करना पड़ा। इस मेँ छोटी-छोटी लड़ाईयां भी शामिल थी। जैसे कि आदिवासियों की तरह या उससे भी पहले जब मनुष्य गुफाओं में रहता था। तब भी भोजन के लिए होने वाली लड़ाई, आश्रय स्थल जैसे गुफा आदि के लिए होने वाली लड़ाई और प्रेम का अधिकार पाने के लिए अर्थात पुरुषों में नारी को पाने के लिए होने वाली लड़ाई।

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युद्ध कलाओं के विकास का क्रम (development order of martial arts)

ऐसे बने हथियार (birth of arms)

पहले मनुष्य जानवरों की तरह आपस में लड़ता था। अपने प्रतिद्वंद्वी को हराने के लिए उसने पहले अपने हाथों का ही प्रयोग किया होगा। फिर पत्थर या लकड़ी फेंक कर सामने वाले को डराने या उसे चोट पहुँचाने का प्रयास किया होगा। जिस लकडी या पत्थर से उसने अपने प्रतिद्वंद्वी को हराया होगा, जान से मारा होगा या घायल किया होगा। उसे ही अपना हथियार मानकर अपने पास रख लिया होगा और इसको और भी कई अन्य अवसरों पर प्रयोग किया होगा। धीरे-धीरे लकड़ी के हथियार बनाये होंगे। किसी एक विशेष हथियार को किसी एक विशेष तरीके से प्रयोग करना सीखा होगा। जैसे हथौड़े से प्रहार करने के तरीका। छोटे आकार का हथौड़ा एक औज़ार है और यदि यही हथौड़ा बड़ा कर दिया जाये तो ये एक हथियार की तरह प्रयोग किया जा सकता है।

हथियारों का विकास (development of arms)

धीरे-धीरे इन हथियारों के आकार व आकृतियाँ बदलते रहे। आकार में वो छोटे-बड़े होते रहे और आकृतियां भी अलग-अलग होती चली गयीं। जिनसे अलग-अलग हथियारों का जन्म हुआ। धीरे-धीरे धातु का प्रयोग शुरू होने पर हथियार भी धातु के बनने लगे और उनकी मारक क्षमता भी बढ़ गयी।

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ऐसे सीखी युद्ध कलाएं  (how we learned martial arts)

जैसे-जैसे मानव सभ्य होता चला गया उसने अपनी पुरानी लडाईयों के अनुभव से प्रहार करने और प्रहार से बचने के कई तरीके सीख लिए। कुछ दांव-पेंच उसने अपने अनुभव से तो कुछ दूसरों को लड़ता देखकर सीखे। कुछ दांव उसने अलग-अलग जानवरों को शिकार करता देख कर सीखे। इसी आधार पर जानवरों से मनुष्य ने इस कला को सीखना प्रारंभ किया। जो कि आगे चलकर खाली-हाथ एवं हथियार से लड़ने की कई प्रकार की युद्ध कलाओं का आरंभिक चरण बनी।ऐसे हुआ युद्ध कलाओं का जन्म और विकास।

युद्ध कलाएं बढ़ने लगी पीढ़ी दर पीढ़ी (how did martial arts grow)

जिन दांव, पेंचों और तरीकों को मानव ने अपने अनुभव से सीखा उन्हें आगे औरों को भी सिखाया। यह दांव पीढ़ी-दर-पीढ़ी सिखाए गए। पिछली पीढ़ी के अनुभव नई पीढ़ी के पास जाने पर उनमें नई पीढ़ी के द्वारा खोजे गए नए दांव-पेंच शामिल होते चले गए। इस तरह यह मार्शल आर्ट, युद्ध कला या सुरक्षा प्रणाली और भी अधिक समृद्ध हो गयी।

युद्ध कलाओं पर होने लगे अनुसन्धान (researches on martial arts)

फिर समय परिवर्तन के साथ साथ कुछ बुद्धिजीवियों ने इन शैलियों पर परीक्षण, अनुसंधान और अध्ययन किए। इन विस्तृत अनुसंधानों के पश्चात् ये शैलियां सुव्यवस्थित, सुसंगठित तथा सुनियोजित हो गयी। कई पीढियों के सदियों के अनुभव के परिणामस्वरुप ये शैलियां विकसित होकर परिपूर्ण एवं अपने आप में सम्पूर्ण युद्ध कलाएं बन गई।

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युद्ध कलाओं के अलग अलग रूप (different types of martial arts)

इन युद्ध कलाओं या आत्मरक्षा की कलाओं का अलग-अलग स्थान पर अलग-अलग विकास हुआ। विभिन्न समय, स्थान और स्थानीय बुद्धिजीविओं के अनुभव जुड़ने पर अलग-अलग स्थान पर युद्ध कलाओं ने अलग-अलग रूप और नाम ले लिए।ऐसे हुआ युद्ध कलाओं का जन्म और विकास।

खो गया है बहुत कुछ (we lost so much)

इन युद्ध कलाओं के विषय में जो भी जानकारी वर्तमान समय में उपलब्ध है। उसमें शारीरिक और मानसिक शक्तियों का ऐसा प्रयोग भी शामिल है जिसे आज के समय में असंभव कहा जायेगा। जैसे उड़ कर या अदृश्य होकर एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुंचना। अपने हाथ या आँखों के संकेत मात्र से सामने वाले पर आघात करना। अपने हाथ के प्रहार से पेड़ या किसी भारी खम्भे को गिरा देना।

सदियों की इस यात्रा में इन युद्ध एवं द्वंद्व कलाओं का जहाँ विकास हुआ है वहीं बहुत कुछ ऐसा भी है जो खो गया। या तो वो सिर्फ कहानियों में ही रह गया या फिर वो मात्र कल्पनाएं ही था। ये मात्र कल्पनाएं थीं या सत्य था इस पर विवाद तो अवश्य किया जा सकता है, किन्तु इस प्रश्न का उत्तर दे पाना कठिन है या शायद असंभव। हम अपने इस लेख के द्वारा आपको भारतीय युद्धकला के इतिहास के विषय में कि ऐसे हुआ युद्ध कलाओं का जन्म और विकास की जानकारी देने की कोशिश की है। आपको हमारा यह प्रयास कैसा लगा, अपने विचार कमेन्ट बॉक्स में अवश्य साझा करें।