यह है बसंत ऋतु का पावन पर्व (Holy spring festival)   

बसंत पंचमी का त्यौहार ऋतु परिवर्तन के समय पर आता है, इसलिए बसंत पंचमी का पर्यावरण के साथ गहरा सम्बन्ध है। साथ ही यह त्यौहार हमारी भारतीय संस्कृति एवं धार्मिक परंपरा से भी जुड़ा हुआ है। शीत ऋतु की समाप्ति और ग्रीष्म ऋतु के आगमन से पूर्व ही इस त्यौहार को मनाया जाता है। आइये हम आज आपको बसंत पंचमी का इतिहास एवं महत्व के विषय में विस्तार से जानकारी देते हैं।

ऋतु परिवर्तन का पावन पर्व है बसंत पंचमी (The best festival of seasons is Basant Panchami)

जैसे ही सर्दियों का मौसम जाने को होता है, सर्द हवाएं चलनी कम हो जाती हैं। उस समय प्राकृतिक सौन्दर्य की छटा का मनोहर रूप देखने को मिलता है। इस ऋतु के आते ही प्रकृति में जैसे नयी सी उमंग का आगमन हो जाता है। विभिन्न प्रकार के पेड़-पौधे, वनस्पति और उन पर खिलते नवीन पुष्प, बागों और खेतों को और भी सुंदर बना देते हैं। वृक्षों की लताओं में नयी सी कोपलें फूटती हुई दिखने लगती है। आम के पेड़ों पर बौर आने लगते हैं। रंग-बिरंगी तितलियाँ एवं भौरे, फूलों पर मंडराने से लगते हैं। खेतों में सरसों के पीले-पीले फूलों की भरमार हो जाती है। गेहूं की फसलों में गेहूं की बालियाँ लग जाती हैं, तथा सरसों के फूल पूर्ण रूप से खिल जाते हैं। ऐसे में खेतों की धरती में जैसे पीली एवं सुनहरी सी चादर बिछी हुई सी प्रतीत होती है। वनों में लाल-लाल टेसू के फूलों को देखकर सबके हृदय में हर्ष-उल्लास, आनंद एवं मस्ती का संचार सा भर जाता है। गेंदा, गुलाब, चंपा एवं चमेली के फूलों की सुंदर आभा से प्राकृतिक छटा विभोर सी होने लगती है। इस मौसम की विशेषता यह है कि यह बड़ा ही सुहावना मौसम होता है। क्योंकि इस समय ना तो अधिक सर्दी होती है, और ना ही अधिक गर्मी। इस ऋतु के आगमन पर होली का पावन पर्व भी आने वाला ही होता है। वसंत ऋतु के आगमन के समय बसंत पंचमी का यह पर्व मनाया जाता है।

बसंत पंचमी है के हैं और भी नाम (other names of basant panchami)

इस पर्व को मौसम के बदलाव के समय मनाया जाता है। बसंत पंचमी को और नामों से भी पुकारा जाता है। बसंत ऋतु के ऋतुओं के राजा होने के कारण इस त्यौहार को ‘ऋतुराज पर्व’ भी कहा जाता है। साथ ही इसे एक अन्य नाम ‘श्री पंचमी’ से भी जाना जाता है।

इस दिन किये जाते हैं ये शुभ कार्य: अनबूझ मुहूर्त

धार्मिक दृष्टि से भी इस पर्व का बहुत महत्व माना जाता है। श्री पंचमी पर्व होने के कारण इस दिन को अति शुभ दिन माना गया है। इसलिए इस दिन कई शुभ कार्य बिना किसी पंडित से पूछे भी किये जा सकते हैं, जिन्हें अनबूझ मुहूर्त कहा जाता है। कई कार्यों के लिए बसंत पंचमी का ये त्यौहार एक शुभ मुहूर्त माना जाता है जैसे विवाह के लिए शुभ मुहूर्त, नए घर की स्थापना के लिए शुभ मुहूर्त, गृह-प्रवेश के लिए शुभ मुहूर्त, घर में मूर्ति स्थापना के लिए शुभ मुहूर्त, नामकरण के लिए शुभ मुहूर्त एवं नए व्यापार का आरंभ करने के लिए शुभ मुहूर्तबसंत पंचमी के अनबूझ मुहूर्त पर इन कार्यों को करना अति शुभ माना जाता है।

माता सरस्वती और कामदेव की पूजा

बसंत ऋतु का स्वागत करते हुए इस पर्व को माघ महीने के पांचवें दिवस को बसंत पंचमी के रूप में मनाया जाता है। शास्त्रों के अनुसार इस पर्व को विद्या एवं ज्ञान की देवी माता सरस्वती की पूजा के महान पावन पर्व के रूप में भी जाना जाता है। बिहार, नेपाल, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा एवं असम में इस दिन लोग माता सरस्वती का पूजन करते हैं। इस दिन कुछ लोग व्रत-उपवास रखते हैं। देवी सरस्वती की वंदना करते हुए भक्ति संगीत का आयोजन करते हैं।

बसंत पंचमी का त्यौहार मुख्य रूप से भारत के उत्तर, पश्चिमी और मध्य भाग में मनाया जाता है। आंध्र प्रदेश में इस पर्व को ‘श्री पंचमी’ के नाम से मनाया जाता है। भारत के कई स्कूलों, कालेजों एवं शिक्षा संस्थानों में बसंत पंचमी का उत्सव बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। इस दिन वहां पर पुस्तकों, वाद्य यंत्रों एवं उपकरणों की भी पूजा की जाती है। तत्पश्चात माता सरस्वती की वंदना की जाती है।  

इंडोनेशिया (indonesia) देश के बाली (bali) प्रान्त में भी ये त्योहार मनाया जाता है। वहाँ इस त्यौहार को ‘हरी राया सरस्वती’ (hari raya saraswati indonesia) के नाम से मनाया जाता है। हरी राया सरस्वती (hari raya saraswati) का अर्थ है ‘सरस्वती का बड़ा दिन‘।     

पुराणों में वर्णन मिलता है कि इस दिन भगवान् विष्णु, माता सरस्वती एवं कामदेव की पूजा का विशेष फल मिलता है। कुछ मंदिरों में इस दिन कामदेव की पूजा भी की जाती है।

पीले वस्त्र, पतंग और सरसों के पीले फूल (yellow costumes, kites yellow mustard flowers)

उत्तर भारत में जहाँ कि हमारे देश में खेतीबाड़ी अधिक मात्रा में की जाती है। वहां पर किसान लोग अपनी फसलों को विशेषकर, सरसों के फूलों को इस त्यौहार का संकेत मानकर पीले रंग के वस्त्र पहनकर इस त्यौहार को मनाते हैं। पंजाब राज्य में इस दिन पतंगबाजी का विशेष आयोजन किया जाता है। पीले रंग की डोर एवं पतंगों से सारा आकाश भर सा जाता है।

बसंत पंचमी और ब्रह्मा जी की पौराणिक कथा (Legend of Basant Panchami)

प्राचीन हिन्दू धार्मिक ग्रंथों के अनुसार जब परमपिता परमात्मा ने सृष्टि की सरंचना की तो उस समय उन्होंने यह कार्य ब्रह्माजी को सौंपा। ब्रहमाजी ने परमात्मा के आदेश से सृष्टि की रचना का कार्य आरम्भ किया। जब वह सृष्टि की रचना कर रहे थे उस समय उन्हें यह प्रतीत सा होने लगा कि इन तीनो लोकों में कुछ अधूरापन सा है। सारे संसार में एक विचित्र सी शांति छाई हुई है। उसी समय उन्होंने भगवान् विष्णु जी से आज्ञा लेकर अपने कमंडल से पवित्र जल लेकर कुछ बूंदों को पृथ्वी पर छिड़का। तो उस समय उन्हें भूलोक पर एक अद्भुत से प्रकाश का बिम्ब प्रकट सा होता हुआ प्रतीत हुआ। इसी समय वन के बीच वृक्षों के बीच में से एक अद्भुत सी प्रकाशमय शक्ति प्रकट हुई। और देखते ही देखते इस शक्ति ने एक सुंदर नारी का रूप धारण कर लिया। इस स्त्री ने श्वेत वस्त्र धारण किये हुए थे। यह स्त्री एक चतुर्भुज देवी के रूप में थी जिसके एक हाथ में वीणा, बाकि दोनों हाथों में पुस्तक एवं माला थी। यह तीनो ही वस्तुएं ज्ञान एवं विद्या की प्रतीक हैं। तत्पश्चात उस देवी ने उस वाद्य यंत्र वीणा से संगीत को प्रकट किया। संगीत की उन अलोकिक धुनों से सम्पूर्ण सृष्टि झूम उठी। कहा जाता है कि सर्वप्रथम संगीत के उस सृजन से ही ब्रह्मांड के सभी जीवों को मधुरता से परिपूर्ण वाणी की अनुभूति हुई। इसके बाद सभी देवताओं ने उस देवी को प्रणाम किया तथा उसे विद्या एवं ज्ञान की देवी ‘माता सरस्वती’ कहकर संबोधित किया। इस देवी को माता सरस्वती के अलावा कई और नामों – वीणा-वादिनी, शारदा और बागीश्वरी कहकर भी पुकारा जाता है। यानि कि इस देवी को ज्ञान, बुद्धि, संगीत और समस्त कलाओं की देवी मानकर पूजा जाता है। चूंकि बसंत पंचमी (माघ महीने के पांचवें दिवस) के दिन इस देवी का जन्म हुआ था। इसलिए इस दिन को इनके जन्मोत्सव के रूप में बड़े ही हर्ष-उल्लास एवं श्रद्धा के साथ सम्पूर्ण भारत में मनाया जाता है।             

श्री सरस्वती चालीसा दोहा (Maa Saraswati Chalisa Doha)

यहाँ पर हम श्री सरस्वती चालीसा में से एक दोहा प्रस्तुत कर रहे हैं, जो कि माता सरस्वती की वंदना से सम्बंधित है:-

जनक जननी पद्मरज, निज मस्तक पर धरि।

बंदौ मातु सरस्वती, बुद्धि बल दे दातारि।।

पूर्ण जगत में व्याप्त तव, महिमा अमितु अनन्तु।

दुष्टजनों के पाप को, मातु तु ही अब हन्तु।।  

मित्रो बसंत पंचमी का इतिहास एवं महत्व के विषय में हमने इस लेख के द्वारा इस पर्व के सम्बन्ध में कुछ जानकारी देने का प्रयास किया है। यदि आप भी इस पर्व के विषय में कुछ कहना चाहें तो अपने विचार कमेन्ट बॉक्स में लिखें।  

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भारतीय युद्ध कलाओं में मेरी रुचि शुरू से ही काफी रही है। घर की दीवार पर टंगा नॉनचक मुझे हमेशा चिढ़ाता रहता है। अलग अलग मार्शल आर्ट्स के बारे में जानने की ललक मुझमें हमेशा से ही रही। कई अलग अलग मार्शल आर्ट्स के बारे में मैं अक्सर रिसर्च करता रहता हूँ। जब भी कुछ नया सामने आता है तो कोशिश करता हूँ कि उसे एक लेख के रूप में पिरो कर आपके सामने रखूँ। इसमें युद्ध कलाओं की अधिकता होती है लेकिन इसके अलावा भी अगर मुझे कुछ लिखने का मौका मिले तो मैं चूकता नहीं।